बलात्कार: मानवता की चीत्कार।

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ब्यूरो छत्तीसगढ़ः सुनील चिंचोलकर।

बलात्कार: मानवता की चीत्कार।

संजय सोंधी, उपसचिव, भवन एवं निर्माण विभाग ( दिल्ली प्रशासन)

किसी अस्पताल के सेमीनार रूम में या किसी सड़क के किनारे अर्धनग्न हालत में पड़ा अबोध बालिका या व्यस्क युवती का शव, टूटे हुए दांत, फूटी हुई आँखें, हाथों से अलग लटकती उंगलियाँ, गुप्तांगों से बहता खून….. ऐसा वीभत्स दृश्य की देखने वालों की रूह तक कांप जाती हैं (कोलकाता केस, 2024) l अजनबी लोगों को भी इस तरह की तस्वीरें भीतर तक हिला देती हैं तो इन्हें देख कर इनके माँ-बाप और परिवार के सदस्यों पर क्या गुजरती होगी इसका हम और आप अंदाज भी नहीं लगा सकते।मानवता पर प्रहार करती ये घटनाएँ समाज के दिशाहीन विकास के कुरूप चेहरे को दिखाती हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2022 के आँकड़ों के अनुसार देश में प्रतिदिन बलात्कार की 86 घटनाएं होती हैं। ये आंकड़ा और भी भयानक रूप से सामने आता हैं जब हमारे संज्ञान में ये बात आती हैं कि ये आँकड़ा केवल पुलिस में रिपोर्ट की गई घटनाओं का हैं। जो घटनाएँ किसी भी कारणवश पुलिस रिकॉर्ड में नहीं आ पाती उनका आँकड़ा हमारे अनुमान लगाने की सोच से भी परे हैं। हम सब इस सच से वाकिफ हैं कि समाज में बदनामी के डर से और कभी लालच के कारण माता पिता स्वयं अपनी बच्ची के बलात्कार या यौन उत्पीड़न की शिकायत पुलिस स्टेशन में दर्ज़ नहीं करवाते। ऐसी घटनाओं के बाद आमतौर पर सोशल मीडिया के मंचों पर महिला सशक्तिकरण के पक्ष में, महिलाओं के प्रति हो रहे अपराधों के ख़िलाफ़ आंदोलनों की, मृतक की आत्मा की शांति के लिए केंडल मार्च जैसे कार्यक्रम आयोजित करने की कवायदों की बाढ़ सी आ जाती हैं। इसके साथ ही तथाकथित कवियों और कथाकारों को भी जैसे लिखने का मुद्दा मिल जाता हैं उनकी लेखनी तो जैसे संविधान बदलने को आतुर हो जाती हैं। सोशल मीडिया के ऑफ लाइन व ऑन लाइन मंच इस तरह की घटनाओं की भयावहता को दिखाते व वर्णित करते हैं उस पर बहस करते हैं और फिर एक-दो सप्ताह में सबकी जिम्मेदारियों का अंत हो जाता हैं फिर दूसरी ख़बरें चलने लगती हैं l ऐसा लगता हैं जैसे फिर किसी दूसरी घटना के होने का इंतज़ार किया जा रहा हो। फिर किसी स्त्री के साथ कुछ वीभत्स काण्ड होता हैं और फिर लाखों की संख्या में लोग सड़कों पर उतरते हैं, नारी सम्मान और अस्मिता की रक्षा के नाम पर सड़कें और प्लेटफार्म जाम करते हैं, तथाकथित महिला संस्थाएँ भाषणबाज़ी करती हैं, सरकारी व्यवस्था को चरमराने के लिए दिल से तोड़ फोड़ करती भीड़, किसी कमरे या टीवी चेनल के कमरे के कोने में बैठे हमारे समाज और संस्कारों के ठेकेदार सो-काल्ड नेता गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाते हैं, फिर एक-सप्ताह का शोर उसके बाद शांति। कुछ दिनों की ये सक्रियता फिर विकास की अंधी दौड़ के अन्धकार में खो जाती हैं।

कुछ नहीं बदलता, न विधिक व्यवस्था, न लोगों की सोच और न लोगों के कार्य …… सब सामान्य हो जाता है, लोग भूल जाते हैं l इस पूरे संजाल में उपेक्षित, असहाय व भयभीत और अकेली रह जाती हैं स्त्रियों की सुरक्षा और उनकी अस्मिता।


पैसा, पद, स्वार्थपूर्ति और लालच के कीचड़ में तेज़ गति से दौड़ने वाले ही वास्तव में इस तरह की घटनाओं का आधार बनाने वाले लोग हैं। ये बहुत योजनाबद्ध तरीकें से बलात्कार की घटनाओं को अंजाम देते हैं जिनकी न कहीं रिपोर्ट दर्ज़ होती हैं, न कहीं शोर होता हैं। ऐसे योजनाबद्ध बलात्कार होते हैं हमारे घरों में होते हैं। जहाँ पिता, बड़ा/छोटा भाई या किसी निकट रिश्तेदारी का दबंग पुरुष अपनी हवास की पूर्ति के लिए या पैसा कमाने के लिए अबोध बालिकाओं के साथ बलात्कार करते हैं। उन बच्चियों को ये जानकारी भी नहीं होती कि उनका बलात्कार हुआ। पर उनकी आत्मा , उनके जीवन के रिश्ते वहीँ खत्म हो जाते हैं (निशि मंगला, 2012)। प्यार, दोस्ती और शादी के नाम पर लड़कियों के साथ होने वाले बलात्कारों से अखबार भरे रहते हैं।

ऐसी छिपी हुई बलात्कार की घटनाओं से इस अपराध की भयावहता कम नहीं होती। निकट परिजनों से बलात्कार पीड़ित महिलाएँ जिन्हें वेश्यावृति की राह में लाकर छोड़ दिया जाता हैं वो अपना पूरा जीवन अमानुषिक यातनाओं और दर्द में गुजारती हैं।

रिपोर्ट की गई बलात्कार की घटनाओं में तो क्रूरता की सारी हदें पार कर दी जाती हैं, पीड़ित स्त्री का जीवन ही समाप्त कर दिया जाता हैं। वह मानवता की सारी लक्ष्मण रेखाओं को पार कर देते हैं। आज के भयपूर्ण माहौल में केवल स्त्री ही नहीं वरन उनका पूरा परिवार भयाक्रांत स्थिति में हैं। दिल्ली जैसे महानगर में जो कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र भी हैं वहाँ इस विषय में शोध करते कुछ आख्यान स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं।

शकुंतला मानी (65 वर्ष, रिटायर्ड प्रिंसिपल) कहती हैं कि बेटियाँ रात को उठ कर नहीं खाती, न ज्यादा खर्च करती हैं। बल्कि बेटों से ज्यादा प्यार और सेवा करती हैं फिर भी लोग बेटियाँ नहीं चाहते क्योंकि पहले लोग दहेज़ के मारे जला देते थे और अब दहेज़ का राक्षस बलात्कारी बन कर गलियों में डोल रहा हैं। ऐसे कोई तडपा कर मारे या कोई ससुराल वाले दुखी करे इससे तो अच्छा हैं कि गर्भ में ही मार दो।

सोनाक्षी (27, सॉफ्टवेयर इंजिनीयर) कहती हैं कि बड़े भाई ने बाजार में किसी लड़के से बात करने पर मुझे और मम्मी को बहुत सुनाया यहाँ तक कह दिया कि ऐसे ही बलात्कार होते हैं लड़कियों के। नौकरी पर जाओ किसी से खास कर लड़के से बात करने की जरूरत नहीं हैं। जब कुछ होगा न तो मैं साथ नहीं दूंगा ऐसी आवारा बहन का।

क्या त्रासदी हैं – 78 वर्ष परिपक्व भारतीय समाज – भय और हिंसात्मक दरिंदगी में भी औरत को पीड़ित करता हैं और दूसरी ओर परिवार के प्यार और सुरक्षा के नाम पर भी औरत को ही पीड़ित करता हैं। समाज और सरकार को “औरत ही पीड़ित और औरत को ही सजा” की इस विडंबनापूर्ण स्थिति को बदलना होगा। यदि स्थितियों को बदलने के गंभीर प्रयास नहीं किए गए तो या तो औरतों को अस्तित्व की मिट जायेगा या फिर फूलन देवी के इतिहास की पुनरावृत्ति समाज में दिखने लगेगी। दोनों ही स्थितियाँ सामाजिक संतुलन के लिए नकारात्मक हैं।

आपराधिक मानसिकता वाले लोगों को समाज में किसी तरह की दया या छूट (कम उम्र के अपराधी) नहीं दी जानी चाहिए। इसके लिए कुछ कार्य सटीकता से किए जाने चाहिए। यथा – विधिक प्रक्रिया में तत्काल बदलाव करके बलात्कार के केसों का फास्ट ट्रैक अदालतों के माध्यम से एक माह के भीतर न्याय किया जाए।

बलात्कारी के लिए फांसी की सज़ा का प्रावधान सुनिश्चित हो। ट्रायल सिर्फ इस बात के लिए हो कि अपराध से जुड़े और कितने लोग हैं जिससे कोई भी अपराधी सज़ा से बच न पाए। इसके साथ ही संवेदनशील समाज को भी इस अपराध को रोकने के लिए अहम् भूमिका निभानी होगी।

परिवार के स्तर पर अपने बालकों (विशेष रूप से लड़कों को) के हिंसात्मक व्यवहार और नकारात्मक यौन प्रवृत्तियों का सटीक निरीक्षण करना और आवश्यकता पड़ने पर उन्हें उचित मार्गदर्शन दिलवाना परिवार की जिम्मेदारी हैं।

अपनी बालिकाओं को भी समयानुसार उचित मार्गदर्शन दे।

समाज में अपने आस पास के लोगों के शब्दों में, व्यवहारों में या आदतों मेमन कुछ भी अजीब या असामन्य दिखे तो तत्काल सचेत हो जाए व अन्यों को इसके बारे में अवश्य बताए।

इस विषय पर बहुत जल्द बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता हैं। यहाँ अपनी बात को विराम देते हुए हम इस बात का पुरजोर समर्थन करते हैं कि इस प्रकार का अपराध करने वाले अपराधी को न्यायिक प्रक्रिया से कठोरतम दंड दिया जाए।

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