संजय सोंधी (संयुक्त निदेशक) शिक्षा निदेशालय दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
शून्य-हस्तक्षेप का भ्रम और सक्रिय पारिस्थितिक
प्रबंधन की आवश्यकता।
वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता की सुरक्षा केवल मानव गतिविधियों को पूरी तरह बंद कर देने मात्र से संभव नहीं है। यद्यपि मानवीय बस्तियों, अवैध कटाई, खनन और अवैध शिकार जैसे सीधे हस्तक्षेपों को रोकना प्राकृतिक आवासों के पुनरुद्धार की प्राथमिक शर्त है, लेकिन यह स्वयं में पूर्ण समाधान नहीं है। जलवायु परिवर्तन, आक्रामक विदेशी प्रजातियों का प्रसार, आनुवंशिक पृथक्करण और प्राकृतिक आवासों का विखंडन जैसे संकट केवल ‘शून्य-हस्तक्षेप’ या प्राकृतिक निष्क्रियता से ठीक नहीं हो सकते। इसके लिए केवल दूरी बनाने के बजाय एक सुदृढ़, वैज्ञानिक और सक्रिय प्रबंधन रणनीति की आवश्यकता है।
प्राकृतिक संतुलन में आए जटिल बदलावों को संभालने के लिए सक्रिय वैज्ञानिक हस्तक्षेप अनिवार्य हो जाता है। उदाहरण के लिए, जब किसी संरक्षित क्षेत्र में बाहरी आक्रामक वनस्पतियाँ देशी वनस्पतियों को विस्थापित कर देती हैं, तो मानवीय हस्तक्षेप के बिना स्थानीय तृणभक्षी जीवों के लिए भोजन का संकट खड़ा हो जाता है। इसी प्रकार, पृथक-थक हो चुके जंगलों में सीमित जीव आबादी के कारण इनब्रीडिंग (अंतःप्रजनन) का जोखिम बढ़ता है, जिसे दूर करने के लिए जीवों का नियंत्रित स्थानांतरण आवश्यक होता है। संकटग्रस्त प्रजातियों के संरक्षण के लिए कृत्रिम प्रजनन, टीकाकरण और आवास सुधार जैसे उपाय प्रत्यक्ष वैज्ञानिक प्रयास ही हैं, जिन्हें छोड़ा नहीं जा सकता।

इस दिशा में वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर कई सकारात्मक प्रयास चल रहे हैं। संरक्षित क्षेत्रों और राष्ट्रीय उद्यानों का दायरा बढ़ाकर वन्यजीव गलियारों (वाइल्डलाइफ कॉरिडोर) का निर्माण किया जा रहा है, ताकि खंडित वनों के बीच जीवों की सुरक्षित आवाजाही बनी रहे और आनुवंशिक विविधता सुरक्षित रहे। सामुदायिक संरक्षण मॉडलों के माध्यम से स्थानीय और आदिवासी समुदायों को संरक्षण में भागीदार बनाया गया है, जिससे मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी आई है और अवैध शिकार की घटनाओं पर लगाम लगी है। इसके अलावा, सैटेलाइट ट्रैकिंग, एआई आधारित निगरानी कैमरों और ड्रोन जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर अवैध घुसपैठ को रोका जा रहा है और प्रजातियों की जनसंख्या गतिशीलता पर डेटा-आधारित नजर रखी जा रही है।
भविष्य के ठोस संरक्षण तंत्र के लिए बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। सबसे पहले, खंडित पारिस्थितिकी तंत्रों को आपस में जोड़ने के लिए भूमि उपयोग नीतियों का सख्ती से विनियमन करना होगा। दूसरे, आक्रामक विदेशी प्रजातियों के प्रभावी उन्मूलन और स्थानीय वनस्पतियों के पुनःरोपण के लिए दीर्घकालिक वैज्ञानिक कार्यक्रम चलाने होंगे। तीसरे, जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने के लिए जल स्रोतों के पुनरुद्धार और पारिस्थितिक पुनर्स्थापना पर जोर देना होगा। अंततः, संरक्षण नीतियों को केवल सीमाओं के भीतर कैद रखने के बजाय स्थानीय समुदायों के आर्थिक हितों से जोड़ना होगा, ताकि वे संरक्षण के प्राकृतिक प्रहरी बन सकें। वन्यजीव संरक्षण केवल प्रकृति को अकेला छोड़ने का नाम नहीं है, बल्कि उसके नष्ट हुए संतुलन को वैज्ञानिक और रणनीतिक प्रयासों से पुनर्स्थापित करने की एक सतत प्रक्रिया है।






