राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग 9)
हीरा ने कला से विवाह का निर्णय ले लिया था। समाज के विरोध के बावजूद, कला उसके लिए केवल एक सेवक नहीं था; वह आत्मीयता का साधक था, और हीरा की दृष्टि में यही सबसे बड़ा गुण था। विवाह सादगी से होना था न कोई दिखावा, न कोई आडंबर।
विवाह की व्यवस्था के लिए हीरा ने बीड़ी सेठ बैजनाथ से अपने पिता के मकान का एक हिस्सा गिरवी रखकर एक हजार रुपये का कर्ज लिया। यह राशि छोटी नहीं थी, पर सेठ की इच्छा दृढ़ थी। उन्होंने कहा था, “हीरा बाई की बेटी, मेरी बेटी की तरह है। उसका विवाह किसी तरह रुक नहीं सकता।
हीरा को आश्चर्य हुआ जब उसने सामूहिक भोजन के लिए समाज को परंपरागत तरीके से आमंत्रित किया। सगाई के समय विरोध तो हुआ था, कानाफूसी भी हुई थी, कुछ घरों से साफ मना भी कर दिया गया था। फिर भी जब भोजन का दिन आया, तो पूरा समाज अपने परिवारों के साथ पहुँच गया। थालियाँ सजीं, बर्तन चमके, और आँगन में बैठे लोग पहले से कहीं अधिक सहज दिख रहे थे।
अनेक नातेदार और समाज के लोग बारातियों का स्वागत करने स्वयं आगे बढ़े। जैसे कोई पुरानी गाँठ अचानक खुल गई हो।यह हृदय-परिवर्तन अचानक नहीं हुआ था। इसका श्रेय तुलसी दाऊ को जाता था गाँव के ठेकेदार। उनकी माँ बहुत दयालु थीं। वर्षों पहले हीरा के पिता खेमचंद के परिवार से उनका गहरा नाता रहा था। मुश्किल समय में उन्होंने खेमचंद के घर का सहारा बनकर खड़ा रहा था। वह स्मृति अभी भी तुलसी दाऊ के मन में जीवित थी। उन्होंने चुपचाप कुछ लोगों से बात की, कुछ घरों में जाकर समझाया, और विरोध की दीवार में एक छोटी-सी दरार डाल दी। बाकी काम समय और लोगों के अंतःकरण ने कर दिया।हर गाँव में कुछ लोग नकारात्मक सोच रखते हैं। वे पुरानी मान्यताओं को दीवार बनाकर खड़े रहते हैं। पर उसी गाँव में कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो सहयोग की भाषा समझते हैं, जो दूसरों के दुख को अपना समझते हैं। ऐसे लोग ही किसी समाज की एकता के स्तंभ होते हैं। वही लोग बदलाव की नींव रखते हैं। वही लोग विकास की दिशा तय करते हैं।
बड़ी सादगी और बिना शोर किए, बिना दावा किए हीरा ने उस दिन भोजन करते हुए समाज को देखा, विरोध करने वाले भी बैठे थे, और स्वागत करने वाले भी। दोनों एक ही थाली के आसपास, उस क्षण उसे लगा कि समाज केवल विरोध नहीं होता, समाज में छिपी हुई करुणा भी होती है, जो सही समय पर जाग उठती है। उस जागृति का श्रेय उन चुप लोगों को जाता है, जो इतिहास की किताबों में नहीं लिखे जाते, पर जिनके बिना कोई भी परिवर्तन अधूरा रह जाता है। हीरा के मनोभाव, बैजनाथ की आंतरिक द्वंद्व, तुलसी दाऊ की चुपचाप की गई कोशिशें, या विवाह के दिन के दृश्य को और जीवंत बनाकर उभरी।
तुलसी दाऊ गाँव के ठेकेदार थे। नाम से लोग उन्हें “दाऊ” ही पुकारते थे। शरीर से हृष्ट-पुष्ट, चेहरे पर हमेशा एक गंभीर मुस्कान, और बातें कम। वे ज्यादा बोलते नहीं थे, पर जब बोलते तो उनकी बात का वजन होता था। गाँव में सड़कें बनवाने, कुएँ खुदवाने या किसी के घर की मरम्मत करवाने का काम आता तो लोग पहले उन्हीं के पास जाते। पर इस बार उनका काम ठेकेदारी का नहीं सामाजिक एकता बनाए रखने का था। हीराबाई की बेटी के विवाह की खबर गाँव में फैलते ही पूरे गाँव के प्रतिष्ठित चौरसिया / पटेल लोग भी बहुत खुश थी । इस विवाह में छेकोडी ने परोक्ष रूप से साथ दिया। अपने पड़ोसी से बोल- मेरी लड़ाई हीरा से है, कला मेरी भांजी है।
तुलसी दाऊ बचपन से खेमचंद के घर जाते और लाल पत्थर को तोड़वाने और खेमचंद के घर गए थे। हीरा तब छोटी थी। माँ कहा करती थीं, “बेटा, दुख के समय जो साथ देता है, वही असली नाता है। बाकी सब दिखावा है।”अब वही हीरा समाज के विरोध का सामना कर रही थी। तुलसी दाऊ ने तय किया कि वे चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने पहले उन घरों का रुख जाना जहाँ विरोध सबसे तेज था। रात के अंधेरे में वे कुछ बुजुर्गों के आँगन में पहुँचे। कोई बड़ा भाषण नहीं दिया। सिर्फ इतना कहा, “तुम्हें याद है खेमचंद? जब उनका घर डूब रहा था तो मेरी माँ उनके साथ खड़ी थीं। आज उनकी बेटी अकेली खड़ी है। क्या हम उसी समाज के लोग हैं जो दुख में साथ देते थे, या अब सिर्फ बातें करते हैं?”कुछ लोग चुप रहे। कुछ ने आँखें फेर लीं। पर एक-दो घरों में दरार पड़ी।फिर उन्होंने उन महिलाओं से बात की जो हीरा की उम्र की थीं। “हीरा ने कला को चुना है।
क्या हम अपनी बेटियों को सिर्फ पैसा और पद देखकर ब्याहते हैं, या इंसानियत भी देखते हैं?” धीरे-धीरे बात फैलने लगी। तुलसी दाऊ ने कहीं भी अपना नाम आगे नहीं रखा। वे सिर्फ बीज बो रहे थे। जहाँ जरूरत पड़ी, वहाँ उन्होंने बैजनाथ सेठ से भी कहा, “सेठजी, चिंता मत करो। कुछ लोग जरूर आएँगे। और जो नहीं आएँगे, उनका आना जरूरी भी नहीं।” विवाह के दिन जब सामूहिक भोजन का इंतजाम हुआ, तो तुलसी दाऊ सबसे पहले पहुँचे। उन्होंने अपने परिवार को भी साथ लाया। जब बारात आई, तो वे स्वयं आगे बढ़कर स्वागत करने वालों में शामिल हो गए। लोगों ने देखा कि ठेकेदार दाऊ खुद खड़े हैं, तो कई हिचकने वाले भी आ गए। जो घर पहले मना कर चुके थे, उनमें से कुछ ने बाद में आकर भोजन किया। विरोध पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ था, पर उसकी धार कुंद पड़ गई थी।हीरा ने बाद में बैजनाथ से पूछा था, “यह सब कैसे हो गया?”
सेठ ने सिर्फ इतना कहा, “तुलसी दाऊ ने कुछ किया है। उनकी माँ की आत्मा अभी भी गाँव में घूमती है।” तुलसी दाऊ ने कभी यह दावा नहीं किया कि हृदय-परिवर्तन उनका काम था। वे जानते थे कि बदलाव एक व्यक्ति से नहीं होता। पर वे यह भी जानते थे कि अगर एक व्यक्ति सही जगह पर सही समय पर खड़ा हो जाए, तो बहुत कुछ संभव हो जाता है। गाँव में नकारात्मक सोच वाले लोग हमेशा रहते हैं। वे पुरानी दीवारों को थामे रखते हैं, उसी गाँव में तुलसी दाऊ जैसे लोग भी होते हैं जो दीवार में दरार डालते हैं, बिना शोर किए, बिना श्रेय लिए। ऐसे लोग ही किसी समाज की एकता के असली स्तंभ होते हैं और इन्हीं स्तंभों पर किसी भी बदलाव की इमारत खड़ी होती है।
(शेष भाग)






