राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग10)
कला और सेवक का विवाह मई 1969 में हुआ था और ग्वालियर ससुराल में नया घर-गृहस्थी का जीवन कला, सेवक के साथ अच्छे से संभालने लगी थी। अपने मायके की चिंता उसे हमेशा सताती। उसके मायके, सागर तिली में जून की शुरुआत में मुन्ना की पढ़ाई की चिंता ने हीरा और गणेश को घेर लिया। मुन्ना बचपन से ही बहुत होशियार लड़का था, गणेश चाहते थे कि उसका दाखिला सागर शहर के किसी अच्छे स्कूल में हो जाए पर अच्छे स्कूलों के दरवाज़े गरीबी के कारण उसके लिए खुलने को तैयार ही नहीं थे।
कभी सरकारी स्कूल, कभी जैन स्कूल, तो कभी म्यूनिसिपल स्कूल गणेश न जाने कितनी बार चक्कर लगा आए। हर जगह एक ही जवाब मिला दाखिले की जगह नहीं है। धूप में भटकते-भटकते उनके कदम जवाब देने लगे थे, चेहरे पर थकान थी और मन में मायूसी। उस दिन वे शाम को गोपाल पटेल की चाय की दुकान पर जाकर बैठ गए। सामने रखी चाय ठंडी होती रही, मगर उनकी चिंता कम न हुई। तभी कोटवार का बड़ा बेटा शंकर वहाँ से आया, गणेश को उदास देखकर वह पास आकर पूछ बैठा, मोसा जी कहता था पूछता है , मुन्ना का एडमिशन नहीं हुआ, अभी तक ?
गणेश ने एक लंबी साँस ली। भैया, सरकारी, जैन और म्यूनिसिपल सब स्कूलों के कई चक्कर लगा लिए, बहुत थक गया हूँ, पर कहीं दाखिला नहीं हुआ।
शंकर ने कुछ पल सोचा, फिर जैसे कोई रास्ता याद आ गया हो, बोला -,
आप मिशन स्कूल जाइए, वहाँ पक्का दाखिला हो जाएगा। उसकी बात सुनकर गणेश के मन में एक छोटी-सी उम्मीद जागी। अगले दिन सुबह उन्होंने अपनी पुरानी, टूटी-सी साइकिल निकाली और मुन्ना को आगे साइकिल के डंडे पर बैठाकर मिशन स्कूल की ओर चल पड़े, रास्ता लंबा लग रहा था। साइकिल कभी चरमराती, कभी डगमगाती, रास्ते में दो बार साइकिल की चैन उतर गई मगर गणेश के मन में पक्का विश्वास था कि आज शायद बेटे की पढ़ाई का रास्ता खुल जाएगा और एक दिन उसके साथ मोटर- साइकल पर घूमूँगा । ये सोचते हुए उसे जोर से हंसी गई.। मुन्ना बोला – जीजा, क्यों हँसे ? गणेश के बच्चे उन्हें पिता की जगह जीजा बोलते थे क्योंकि हीरा की चार बहिनें उन्हे जीजा बोलती थीं। गणेश बोला – बेटा तुम एक दिन अपनी कार में, मुझे घुमाओगे ! मुन्ना – क्यों नहीं। रास्ते भर बाप बेटा बतयाते मिशन स्कूल के मुख्य द्वार पर पहुचे।
स्वीडिश मिशन स्कूल के मुख्य द्वार पर पहुँचकर वे कुछ झिझके। तभी उनकी नज़र प्राचार्या मैडम कुमार पर पड़ी, वे किसी काम से गेट के पास ही खड़ी थीं। गणेश के चेहरे पर डर और संकोच साफ दिखाई दे रहा था। मैडम ने उसे देखकर सहज स्वर में पूछा –
“क्या बात है?” गणेश ने झेंपते हुए हाथ जोड़ लिए और बोले
मैडम जी, मेरा बेटा बहुत होशियार है, इसका आपकी स्कूल में कक्षा छठी में प्रवेश कराना है।
मैडम कुमार ने मुन्ना की ओर देखा फिर स्नेह से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा,
“पढ़ोगे?” क्या नाम है ?
मुन्ना ने तुरंत जवाब दिया,
“जी, मैडम!” पढ़ूँगा ,,मेरा नाम राजन है ।
उसके छोटे-से उत्तर में ऐसी सच्चाई थी कि मैडम के चेहरे पर मुस्कान आ गई। कुछ ही देर में मैडम कुमार के निर्देश पर दस रुपये फीस लेकर मुन्ना का स्वीडिश मिशन स्कूल में दाखिला हो गया। गणेश को जैसे यक़ीन ही नहीं हुआ जिन दरवाज़ों पर वे इतने दिनों से भटक रहे थे, वहाँ बेटे के लिए रास्ता इतनी सहजता से खुल गया था।
मुन्ना और गणेश खुशी-खुशी घर लौटे, खबर सुनते ही हीरा के चेहरे पर भी खुशी चमक उठी। बेटे के स्कूल में प्रवेश की खुशी में उसने पड़ोसियों में लड्डू बाँटे। उस छोटे-से घर में उस दिन मिठास सिर्फ़ लड्डुओं की नहीं थी वह मुन्ना के नए सफ़र की, गणेश की चिंता मिटने की और परिवार की उम्मीदों की मिठास थी।
जीवन संघर्ष करते हुए पाँच साल गुज़र गए, मुन्ना कक्षा ग्यारहवीं की परीक्षा में जी जान से मेहनत कर प्रथम श्रेणी में पास होकर पूरे तिली मुहल्ले का दिल जीत लेता है । इधर हीरा और उसकी माँ पार्वती बहुत खुश हैं, क्योंकि मुन्ना के साथ ही देवी का रिजल्ट आता है प्राइमरी कक्षा पाँच स्कूल पास करके मुन्ना के ही मिशन स्कूल में प्रवेश लेता है ।
मुन्ना नाम उसके घर का था,, लेकिन स्कूल में उसका नाम राजन, हीरा ने लिखवाया। राजन, जब कक्षा नौ में तब उसे क्लास का मानीटर, सोनवानी सर बना देते हैं । राजन का आत्म – विश्वास धीरे धीरे बड़ रहा था, तभी से मोना नाम की खूबसूरत लड़की मन ही मन राजन को चाहने लगती है।
(शेष भाग कल)






