राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल
(भाग 12)
अपने किए कर्मों को भोगने की यह कहानी जीवन के धूप-छांव और समय के न्याय को पूरी तरह से चरितार्थ कर रही है। सालों तक किए गए असामाजिक कार्यों और अनीति की राह पर चलने का परिणाम आखिरकार छेकोड़ी के जीर्ण-शीर्ण शरीर पर दिखाई देने लगा था। वह शरीर जो कभी ताकत और घमंड से चूर था, आज क्षय रोग (टीबी) की मार से खोखला हो चुका था। खांसते-खांसते उसकी छाती फटने लगती और हर एक सांस मानो बीते कर्मों का हिसाब मांग रही है, पर कुदरत का नियम भी अजीब है, जहां वह एक हाथ से दंड देती है, वहीं दूसरे हाथ से सुधरने का अवसर भी देती है।
भांजी की शादी का वह पावन अवसर मानो पूरे परिवार के लिए एक नया सवेरा लेकर आया। जब बरसों से कठोर और स्वार्थी रहे भाई के भीतर सकारात्मक हृदय परिवर्तन हुआ, तो उसकी आंखों में पश्चाताप के आंसू देखकर बहन हीरा का कलेजा जुड़ा गया। उसका मन भीतर तक खुश हो उठा कि देर से ही सही, भाई की आत्मा पर जमी मैल धुल रही थी। शादी की शहनाइयां शांत हुईं और विदाई की रुलाई के साथ बेटी अपने नए घर, अपनी ससुराल विदा हो गई। आंगन थोड़ा सूना जरूर हुआ, पर जिंदगी रुकने का नाम नहीं है।
मुन्ना अब बड़ा हो रहा था, उसकी शिक्षा – दीक्षा की चिंता हीरा को हमेशा रहती ,आखिरकार मुन्ना का दाखिला कक्षा छः में करवा दिया गया, जिससे उसकी आंखों में सुनहरे भविष्य के सपने तैरने लगे, मुन्ना जब बस्ता लेकर स्कूल जाता तो पूरा मोहल्ला मुन्ना की चलने की स्टाईल देखकर और पढ़ने का आत्म विश्वास देखकर खुश होता।
मां खुशी से गाना गाती है,,
मेरा बेटा ,चला स्कूल हाथ में फूल ,,बगल में बस्ता,,हमें तके,,वापस आने की रस्ता,,,
दूसरी ओर, गणेश के जीवन में भी एक नए संघर्ष और स्वाभिमान का अध्याय शुरू हो चुका है सिमरिया गांव का वह भारी-भरकम कर्ज, जो उसने अपनी चार सालियों की शादी के लिए लिया था, उसकी आत्मा को तोड़े जा रहा था, पर गणेश ने हार नहीं मानी। अपनी मेहनत की आंच में तपकर उसने सिमरिया गांव के सामंत बाबूसिंह का सारा कर्ज पाई-पाई करके चुका दिया। कर्ज के इस दलदल से मुक्त होने के बाद, वह अपने परिवार और बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए तिली (सागर) आकर बस गया। यहां की लाल पत्थर की खदानों पर पत्थर तोड़ते हुए उसके हाथों में छाले पड़ जाते, पर हर चोट के साथ उसका हौसला और मजबूत होता। इस कठिन संघर्ष में उसकी सास पार्वती भी पीछे नहीं रहीं, वह भी धूप में बैठकर खदान से निकली लाल रेत छानने का काम करती ताकि घर के चूल्हे में दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके।
इधर घर पर, जीवन की गाड़ी को खींचने के लिए हीरा और मुन्ना मिलकर रात-दिन बीड़ी बनाने का काम कर रहे थे। उंगलियों में तंबाकू की महक और पत्तों को लपेटने की यह मशक्कत ही अब उनके जीने का सहारा थी। मेहनत रंग ला रही थी और शायद इसी सामूहिक तपस्या और बदले हुए व्यवहार का असर था कि अब देवीप्रसाद का स्वास्थ्य भी धीरे-धीरे सुधरने लगा था। बीमारी की भयानक गिरफ्त से छूटकर उसका शरीर अब सेहत की ओर लौट रहा था और उससे भी ज्यादा उसका मन शांत और खुश हुआ तो ठीक से पढ़ाई करने लगा। कर्मों की यह धूप-छांव और संघर्षों के बीच पनपती यह शांति, इस परिवार को एक नई दिशा में ले जा रही है।
(शेष भाग कल)






