डॉ. दीपक गोस्वामी
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
करवा चौथ : परंपरा, प्रेम और आस्था का उत्सव
करवा चौथ की परंपरा अनेक लोककथाओं और क्षेत्रीय मान्यताओं से समृद्ध हुई है। वीरवती की कथा इस पर्व की प्रमुख प्रचलित कथाओं में गिनी जाती है। सावित्री-सत्यवान, द्रौपदी और पार्वती से जुड़े आख्यान भी भारतीय सांस्कृतिक स्मृति में निष्ठा, संकल्प और प्रेम के आदर्श प्रस्तुत करते हैं, हालाँकि इन सभी को करवा चौथ की ऐतिहासिक उत्पत्ति से सीधे जोड़ना उचित नहीं होगा।
इस पर्व के पीछे एक गहरा मानवीय भाव भी है,दूरी में भी अपने प्रिय की कुशलता की कामना करना। पुराने समय में यात्राएँ लंबी होती थीं, समाचार देर से पहुँचते थे और प्रतीक्षा जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थी। ऐसे में व्रत और प्रार्थना प्रियजन के प्रति चिंता, आशा और विश्वास व्यक्त करने के माध्यम बने। आज संचार के साधन बदल गए हैं, लेकिन भावनात्मक निकटता की आवश्यकता वैसी ही है। करवा चौथ हमें याद दिलाता है कि साथ रहना पर्याप्त नहीं, एक-दूसरे के लिए समय निकालना और मन की बात सुनना भी आवश्यक है।
मेहंदी की रेखाएँ, माथे की बिंदी, आँखों का काजल, माँग का सिंदूर, हाथों की चूड़ियाँ, गले का मंगलसूत्र और पैरों की पायल,सोलह श्रृंगार भारतीय संस्कृति में सौंदर्य, परंपरा और वैवाहिक जीवन से जुड़ी भावनाओं की अभिव्यक्ति हैं। इनकी सूची और महत्ता अलग-अलग क्षेत्रों में भिन्न हो सकती है, लेकिन इनके माध्यम से अपने मन को सजाने और उत्सव को विशेष बनाने की भावना व्यापक है।
सिंदूर किसी के लिए वैवाहिक पहचान है, मेहंदी प्रिय स्मृतियों का रंग और चूड़ियों की खनक घर में उत्सव का संगीत। इन प्रतीकों के अर्थ हर स्त्री के लिए एक जैसे नहीं होते वे उसकी आस्था, अनुभव और व्यक्तिगत भावनाओं से आकार लेते हैं। इसीलिए श्रृंगार को केवल बाहरी सुंदरता नहीं, आत्म-अभिव्यक्ति के रूप में भी देखना चाहिए।
जब स्त्री सजती है, तो वह अपने प्रिय के प्रति प्रेम व्यक्त कर सकती है, अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ सकती है और अपने भीतर उत्सव का आनंद जगा सकती है। उसका श्रृंगार उसकी अपनी पसंद और प्रसन्नता का अधिकार भी है। प्रेम में सजना सुंदर है, लेकिन अपनी पहचान और स्वाभिमान के साथ सजना उससे भी अधिक सुंदर है।
भारतीय परंपरा में उपवास को आत्मसंयम, आराधना और संकल्प से जोड़ा जाता है। करवा चौथ का व्रत भी अनेक स्त्रियों के लिए श्रद्धा और अपने जीवनसाथी के मंगल की कामना का माध्यम है। हालाँकि, यह दावा वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित नहीं है कि निर्जल उपवास शरीर के सभी विष निकाल देता है या किसी दूसरे की आयु निश्चित रूप से बढ़ा देता है। लंबे समय तक पानी न पीना कुछ लोगों के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है; इसलिए आस्था के साथ शरीर की आवश्यकताओं का ध्यान रखना भी जरूरी है।
व्रत की सार्थकता केवल कष्ट सहने में नहीं, अपने संकल्प के भाव को समझने में है। प्रेम का अर्थ यह भी है कि जीवनसाथी एक-दूसरे की सेहत, सुविधा और भावनाओं का ध्यान रखें। यदि पत्नी व्रत रखती है, तो पति उसका सहयोग करे, घरेलू जिम्मेदारियाँ बाँटे और उसके प्रयास का सम्मान करे। इसी प्रकार दोनों एक-दूसरे की चिंताओं और संघर्षों को समझें। तब व्रत केवल एक व्यक्ति का त्याग नहीं, पारस्परिक संवेदना का अवसर बनता है।
दांपत्य जीवन केवल एक घर में साथ रहने का नाम नहीं, यह विश्वास, संवाद, सम्मान और जिम्मेदारी का निरंतर अभ्यास है। रोजमर्रा की व्यस्तता में कई बार प्रेम अपनी अभिव्यक्ति खोने लगता है। ऐसे में करवा चौथ जैसा उत्सव पति-पत्नी को एक-दूसरे के लिए समय निकालने और संबंध की आत्मीयता को फिर से अनुभव करने का अवसर दे सकता है।
छलनी से चाँद और फिर पति को देखने की परंपरा का एक सुंदर प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि संसार की अनेक व्यस्तताओं के बीच दृष्टि अपने प्रिय पर ठहरती है। लेकिन प्रेम की वास्तविक परीक्षा केवल उस क्षण में नहीं, रोजमर्रा के व्यवहार में होती है कि क्या हम एक-दूसरे की बात सुनते हैं, थकान समझते हैं, कठिन समय में साथ देते हैं और असहमति के बावजूद सम्मान बनाए रखते हैं?
सनातन गृहस्थ जीवन में धर्म और कर्म का यही व्यावहारिक संगम है। धर्म है सत्यनिष्ठा, मर्यादा और संवेदना। कर्म है जिम्मेदारियों को मिलकर निभाना। समर्पण का अर्थ अपनी गरिमा खो देना नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए प्रयास करते हुए दोनों की गरिमा की रक्षा करना है। पत्नी पति की मंगलकामना करे और पति पत्नी की कुशलता का ध्यान रखे,यही प्रेम को एकतरफा त्याग से आगे ले जाकर साझेदारी में बदलता है।
इस पर्व का सामाजिक पक्ष भी महत्वपूर्ण है। कुम्हार, मेहंदी कलाकार, चूड़ी विक्रेता, वस्त्र व्यवसायी और मिठाई बनाने वाले अनेक लोगों के लिए यह आजीविका का अवसर बनता है। उत्सव तब और सार्थक होता है, जब दिखावे के बजाय सामर्थ्य के अनुसार आनंद मनाया जाए और स्थानीय कारीगरों का सम्मान किया जाए।
फिर वह क्षण आता है, जब चाँद क्षितिज पर दिखाई देता है। पूजा की थाली सजती है, जल ग्रहण किया जाता है और जीवनसाथी का चेहरा देखा जाता है। दिन भर की प्रतीक्षा उस पल में सिमट जाती है। यह दृश्य करवा चौथ की भावनात्मक सुंदरता का केंद्र है, लेकिन इसका अर्थ कहीं आगे तक जाता है।
चाँद को देखकर मुस्कराना प्रेम है, जीवनसाथी की बात ध्यान से सुनना भी प्रेम है। पूजा करना आस्था है, बीमारी में सेवा करना भी उसी संवेदना का विस्तार है। व्रत रखना संकल्प है, कठिन समय में साथ निभाना उस संकल्प को जीवन में उतारना है।
“सजना है मुझे सजना के लिए” का सबसे सुंदर अर्थ यही है,मैं तुम्हारे लिए सुंदर क्षण रचूँ और तुम मेरे अस्तित्व का सम्मान करो, मैं तुम्हारे मंगल की कामना करूँ और तुम मेरी कुशलता का ध्यान रखो। हमारा संबंध किसी एक के त्याग पर नहीं, दोनों के विश्वास, सहभागिता और सम्मान पर खड़ा हो।
करवा चौथ की सार्थकता इस बात से नहीं मापी जाती कि श्रृंगार कितना महँगा था या व्रत कितना कठिन। उसकी असली कसौटी यह है कि क्या रिश्ते में आत्मीयता बढ़ी, संवाद गहरा हुआ और एक-दूसरे की जिम्मेदारी साझा करने का भाव मजबूत हुआ।
आकाश का चाँद हर रात निकलकर ढल जाता है, लेकिन व्यवहार में उतरा प्रेम अगली सुबह भी प्रकाश दे सकता है। जहाँ परंपरा के साथ विवेक, समर्पण के साथ स्वाभिमान और प्रेम के साथ परस्पर सम्मान हो, वहाँ उत्सव केवल एक दिन की रस्म नहीं रहता, वह जीवन जीने की सुंदर शैली बन जाता है।
सोलह श्रृंगार से तन को सजाना और प्रेम, विश्वास तथा सम्मान से पूरे जीवन को सँवारना। यही गृहस्थ जीवन का सौंदर्य और सनातन प्रेम के उस महाकाव्य का सार है, जिसे दो लोग मिलकर हर दिन अपने आचरण से लिखते हैं।





