संजय सोंधी (संयुक्त निदेशक) शिक्षा निदेशालय दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071

चलनी के आर-पार: कुंवारों का रुआंसा आसमान और सुहागियों की जमीनी जंग।
आज करवा चौथ के पावन और ‘खतरनाक’ अवसर पर आसमान में चांद कम और कुंवारे युवाओं की लंबी सांसों से उठने वाला धुंआ ज्यादा नजर आ रहा है। एक तरफ हमारे अविवाहित सूरमा हैं, जो कॉलोनी के पार्कों में किसी भी गोल चीज (चाहे वह छननी हो या स्ट्रीट लाइट का घेरा) को देखकर इस भ्रम में जी रहे हैं कि शायद आज उनकी भी कोई अज्ञात प्रेमिका बिना खाए-पिए उनका मुंह देखकर व्रत तोड़ेगी, जबकि हकीकत यह है कि उनके हिस्से में सिर्फ पड़ोसी भाभी की डांट और ठंडी चाय ही आती है। दूसरी तरफ हमारे ‘अनुभवी’ विवाहित महापुरुष हैं, जो सुबह से ही अपनी अर्धांगिनी के हाथों व्रत के पवित्र पाश में ऐसे बंधे होते हैं जैसे पुलिस कस्टडी में कोई कुख्यात मु मुल्जिम हो। सुबह की सरगी से लेकर रात को चांद निकलने तक वे हर पांच मिनट पर आसमान का ऐसा खगोलीय निरीक्षण करते हैं जैसे नासा वाले इसरो के साथ मिलकर कोई नया उपग्रह लॉन्च करने वाले हों। कुंवारे भाई साहब तो इस उम्मीद में गूगल मैप पर चांद की लोकेशन तलाशते रहते हैं कि शायद उनके मोहल्ले में भी कोई चमत्कार हो जाए, पर जैसे ही रात को असली चांद निकलता है, कुंवारों की हसरतें फुसफुसाकर दम तोड़ देती हैं और विवाहितों के चेहरों पर ऐसा वीरगति को प्राप्त करने वाला संतोष झलकता है कि पूछिए मत—एक तरफ दिल जल रहा है तो दूसरी तरफ दिल का चैन उड़ रहा है, बस फर्क इतना है कि कुंवारे बिना व्रत के भूखे हैं और विवाहित व्रत रखकर भी पानी के लिए तरस रहे हैं।






