राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग 14)
मोना, ग्यारहवीं कक्षा में अनुत्तीर्ण हुई एक अल्हड़ खूबसूरत लड़की, जो दिल की एकदम साफ़ है। राजन (राजू/कप्तान साब) मोना का सबसे प्यारा दोस्त, जो प्रथम श्रेणी में पास हुआ है और शाहिद (अब्दुल शाहिद) राजन का जिगरी दोस्त, हमेशा साथ और जोश में रहने वाला मोना के घर भगवान का प्रसाद लेकर जाते हैं।
मोना की भावुक और ममतामयी माँ और फिलिप मोना के पिता, पेशे से बस ड्राइवर, गंभीर लेकिन स्नेही व्यक्ति, मोना के घर का साधारण सा बैठक (Living room) सभी बैठे बैठें हैं। मोना एक कोने में उदास बैठने का नाटक कर रही है, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सी बेफिक्री और खुशी भी है।
राजन,(मुस्कुराते हुए, भगवान का प्रसाद आगे बढ़ाते हुए) आंटी! अंकल! यह लीजिए, परेड हनुमान मंदिर का प्रसाद।शाहिद (गर्व से सीना चौड़ा करके)
हाँ आंटी, खाइए-खाइए! हमारा राजू प्रथम श्रेणी में पास हो गया है! पूरे मोहल्ले में डंका बज गया है आज,,और शर्माते हुए बोलता है,, मैं भी पास हूँ थर्ड डिवीजन। (मोना की माँ आगे बढ़ती हैं, राजन के हाथ से प्रसाद लेती हैं। उनकी आँखें भर आती हैं और वह भावुक होकर राजन के सिर पर हाथ रखती हैं।
माँ-(आँसू पोंछते हुए, भर्राई आवाज में) जुग-जुग जियो बेटा। भगवान करे तुम्हारी यह कामयाबी हमेशा बनी रहे। (एक ठंडी आह भरते हुए मोना की तरफ देखती हैं एक तरफ तुम हो राजन… और एक तरफ यह हमारी मोना है…।
मोना- (बीच में ही माँ को टोकते हुए, चहक कर)
अरे माँ! तुम भी क्या रिज़ल्ट लेकर बैठ गईं। मैं फेल हो गई तो क्या हुआ? मेरे ‘कप्तान साब’ तो पास हो गए न! प्रथम श्रेणी में!
मोना राजन की तरफ गर्व और असीम प्रेम से देखती है। राजन थोड़ा शर्मा जाता है। तभी सोफे पर बैठे फिलिप अंकल, जो अब तक चुपचाप सब देख रहे थे, राजन को अपने पास बुलाते हैं।
फिलिप- (राजन की पीठ थपथपाते हुए, गंभीर मगर प्यार भरे लहजे में) इधर आओ बेटा, मेरे पास बैठो। (राजन बैठ जाता है) बारहवीं तो अच्छे नंबरों से पार कर ली आपने। अब आगे का क्या सोचा है? अब क्या करोगे बेटा?
राजन- (पूरे आत्मविश्वास और आदर के साथ)
अंकल, अब कॉलेज में दाखिला लूँगा आगे की पढ़ाई पूरी करूँगा और अपने बहुत सारे सपने हैं,,उनकी तरफ हर रोज़ एक कदम बढ़ाऊँगा।
शाहिद- (उत्साह से हवा में मुक्का मारते हुए, बीच में कूद पड़ता है) अरे अंकल! कॉलेज तो बस एक ज़रिया है। आप लिखकर ले लीजिए, मेरा यार राजू एक दिन सचमुच का पुलिस कप्तान बनेगा! असली वाला कप्तान साब! लाल बत्ती वाला।
शाहिद की यह बात सुनते ही कमरे का गंभीर माहौल एकदम से बदल जाता है। फिलिप अंकल, माँ, मोना और खुद राजन एक-दूसरे को देखते हैं और पूरा कमरा सबके ठहाकों से गूँज उठता है। मोना राजन को देखकर मन ही मन मुस्कुरा रही है, जैसे उसे शाहिद की बात पर पूरा भरोसा हो क्योंकि प्यार में भरोसा बड़ी बात होती है लेकिन अपनी बात और विश्वास पर कितने लोग (प्यार करने वाले) खरे उतरते हैं?
(शेष भाग कल)






