राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल – (भाग 17)
वर्ष 1981 रेडियो पुलिस से विशेष सशस्त्र बल (SAF) के ऑफिस में आमद दर्ज कराने के बाद, राजन को अन्य नव-नियुक्त आरक्षकों के साथ एक ‘डग्गा बस’ में बिठाकर पीली कोठी, दतिया भेजा गया। वहाँ पहुँचते ही पुलिस की चकाचौंध का भ्रम टूट गया। एक विशाल, ठंडे और बेजान हॉल के कोने में उसे अपनी किट रखने और सोने की थोड़ी सी जगह अलॉट की गई।
वह रात राजन के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी। मच्छरों के झुंड और उनकी भिनभिनाहट के बीच, हॉल की अजनबी दीवारों को देखते हुए उसे अपने घर, बूढ़े माता-पिता और छोटे भाई-बहनों की याद सताने लगी। सुरक्षा बल में आने की खुशी पल भर में ओझल हो गई, और अपनों से दूर होने के दर्द में उसकी आँखों से पूरी रात अनवरत आँसू बहते रहे।
अभी ठीक से आँख लगी भी नहीं थी कि सुबह के ठीक 5 बजे हॉल का दरवाजा धड़धड़ाते हुए खुला, सूबेदार (मेजर) साहब ने अंदर कदम रखा। आते ही उन्होंने बिना रुके, एक ही साँस में बुंदेलखंडी लहजे की तीखी और भद्दी गालियों की बौछार कर दी। यह नए रंगरूटों को जगाने का उनका रोज का “गैर अनुशासित” तरीका था। नींद से बदहवास सभी 60 आरक्षक आनन-फानन में हाफ पैंट और बनियान में बाहर भागे। पहले शारीरिक प्रशिक्षण के अंतर्गत हाड़ कंपाने वाले या पसीने से तर माहौल में एक घंटे तक लगातार दौड़ लगवाई गई।
फिर फाटिग (श्रमदान) के नाम पर आसपास की गाजर -घास कटवाई, फिर
नहाने के बाद जो चाय मिली, वह बेस्वाद थी। दोपहर के नाम पर एक बड़े बर्तन (डग्गा) में पानी जैसी पतली दाल, जली हुई चार रोटियां और बेमन से बनी एक सब्जी परोसी गई, जो नाश्ता और लंच दोनों का काम कर रही थी।
दोपहर भर बंद कमरों में कानून, नियम और सैनिकों के “कर्तव्यों” का पाठ पढ़ाया गया, जहाँ कागज पर तो रक्षक बनने की बातें थीं, लेकिन व्यवहार में केवल कड़ापन था। फिर फुटबॉल का मैदान और प्रतिभा का प्रदर्शन हेतु शाम को दिनभर की थकान के बाद नव -आरक्षकों को एक घंटा फुटबॉल खेलने के लिए दिया गया। राजन, जो भीतर से टूट रहा था, उसने मैदान पर उतरते ही अपनी सारी ऊर्जा झोंक दी। उसने शानदार खेल दिखाते हुए दो गोल दागे। उसकी इस फुर्ती और हुनर ने बाकी साथियों को बता दिया कि वह एक बेहतरीन खिलाड़ी है। खेल के मैदान ने उसे कुछ पलों के लिए मानसिक शांति दी, लेकिन यह शांति बहुत अस्थायी थी।
उसी दिन शाम ने महकमे के उस चेहरे को उजागर किया जिसे राजन कभी देखना नहीं चाहता था। रात होते ही मेजर साहब के साथ कुछ पुराने आरक्षक (कॉन्स्टेबल) बैठ गए वहाँ नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए दारू और मुर्गे की पार्टी शुरू हुई। शराब के नशे में अनुशासन का मुखौटा पूरी तरह उतर गया। रक्षक होने का दावा करने वाले वे लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने लगे, गंदी राजनीति और गाली-गलौज पर उतर आए। करीब तीन घंटे तक चले इस ड्रामे के बाद वे सब वहीं फर्श पर लुढ़क गए। सुबह होने से पहले, अपनी खुमारी (हैंगओवर) उतारने के लिए मेजर साहब फिर उसी पुरानी गाली-गलौज वाली आदत के साथ चिल्लाते हुए आए। यह देखकर राजन का मन पूरी तरह खट्टा हो गया। उसके अंतर्मन ने चीखकर कहा “ये रक्षक ही भक्षक हैं, मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ?”
दूसरे दिन राजन ने तय कर लिया कि वह इस घुटन भरे और अनैतिक माहौल में अपनी आत्मा को नहीं बेचेगा। वह अपना त्यागपत्र (Resignation) लिखकर सीधे सेनानी (कमांडेंट) के ऑफिस में पहुँच गया। सेनानी ने अचरज और गुस्से से उसे देखा और कड़ककर पूछा, “दो ही दिन में क्यों त्यागपत्र दे रहे हो? बरखुरदार ! क्या बात है ?
राजन ने अपनी साफगोई से जवाब दिया, “सर, इधर का माहौल ठीक नहीं है। सब लोग रात को दारू पीकर गाली-गलौज करते हैं। यहाँ अनुशासन नहीं, केवल अभद्रता है। जिसे देखकर मुझे लगा ये भविष्य कैसे हो सकता है ?
यह सुनते ही सेनानी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। सच सुनना सिस्टम के बड़े अधिकारियों को गंवारा नहीं होता। सेनानी गुस्से में चिल्लाया, “जा… इधर से! त्यागपत्र स्वीकार हो गया, जा ढूँढ जहाँ अच्छा माहौल मिले!”
सेनानी (कमांडेंट) के दफ्तर से बाहर निकलते ही राजन ने एक गहरी और चैन की साँस ली। उसे इस बात का संतोष था कि उसने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और उस गंदे माहौल से खुद को आजाद कर लिया।
लेकिन जैसे ही उसके कदम बैरक की तरफ बढ़े, एक नई और भारी चिंता ने उसके दिमाग को घेर लिया। उसका मन इस बात से चिंतित हो उठा कि वह घर जाकर अपने माता-पिता को क्या जवाब देगा? जिन्होंने बड़े अरमानों से उसे नौकरी पर भेजा था, उन्हें वह दो दिन में नौकरी छोड़ने की बात कैसे समझाएगा? समाज के तानों और परिवार की उम्मीदों का बोझ अब उसके कंधों पर भारी होने लगा था।
(आगे का भाग कल)







