राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
‘कर्मफल’ (भाग18)
राजन के जीवन का यह घटनाक्रम उसके चरित्र, पारिवारिक संबंधों और जीवन के प्रति उसके कड़े संघर्ष को गहराई से उजागर करता है। राजन मध्य प्रदेश पुलिस में रेडियो आरक्षक (Radio Constable) के पद पर कार्यरत था। एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सरकारी नौकरी पाना जीवन की सुरक्षा की गारंटी माना जाता है। लेकिन राजन के भीतर कुछ बड़ा करने या व्यवस्था के बंधनों से मुक्त होने की छटपटाहट थी। वह स्वयं को इस नौकरी के खांचे में फिट नहीं पा रहा था। नौकरी छोड़ने का निर्णय कोई आसान फैसला नहीं था इसमें समाज का डर, परिवार की उम्मीदें और भविष्य की अनिश्चितता शामिल थी। लेकिन राजन ने अपने अंतर्मन की आवाज सुनी और अपनी सुरक्षित सरकारी नौकरी को त्यागने का साहसिक कदम उठाया।
राजन ने अपनी ड्यूटी छोड़ी और सीधे दतिया से ग्वालियर के लिए रवाना हो गया। ग्वालियर में उसकी बहन का घर था। राजन के लिए ग्वालियर का यह सफर केवल भौगोलिक दूरी तय करना नहीं था, बल्कि अपनी पुरानी जिंदगी से नाता तोड़कर एक नई और अनिश्चित राह पर कदम बढ़ाना था। बहन के घर जाने के पीछे राजन का मुख्य उद्देश्य एक शांत और सुरक्षित माहौल में बैठकर आगे की पढ़ाई को पूरा करना था।
नौकरी छोड़ने के तुरंत बाद राजन के पास जमा-पूंजी के नाम पर कुछ नहीं था। तत्कालीन समय के हिसाब से ₹200 एक महत्वपूर्ण राशि थी। राजन के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि वह अपनी मां को यह कैसे बताए कि उसने एक अच्छी-भली सरकारी नौकरी छोड़ दी है। एक तरफ नौकरी छोड़ने का मलाल और दूसरी तरफ जेब खाली होने की लाचारी थी। संकोच और स्वाभिमान का टकराव दिल दिमाग में हो रहा था। राजन अपनी बहिन के सामने हाथ फैलाने में बेहद संकोच और अपराध बोध महसूस कर रहा था। उसे डर था कि उसकी मां उसके इस फैसले से आहत होंगी और बहिन के पास इतने पैसे नहीं होंगे ?
जब राजन ने भारी मन और संकोच के साथ बहिन से ₹200 उधार मांगे, तो बहिन कला ने भाई के चेहरे के तनाव को भांप लिया। एक बड़ी बहिन का दिल छोटे भाई की परिस्थिति और उसके भीतर चल रहे तूफान को बिना कहे समझ गया। कला ने बिना कोई कड़ा सवाल किए, अपने पति से अनुरोध किया – मुन्ना ( राजन का घर का नाम) को 200 रु उधर दे दो,,हम दोनों बहिन भाई लोटा देंगे ! सेवक जी ने अपनी छोटी सी बचत में से निकालकर ₹200 राजन के हाथ पर रख दिए।
राजन का दृढ़ संकल्प था कि वह 200 रु के बदले में अपनी बहिन / बहनोई अहसान कभी भूलेगा, वह अपनी शर्तों पर जीने के लिए आर्थिक तंगी और सामाजिक आलोचना झेलने को तैयार है। पारिवारिक ताना-बाना, संकट के समय बहन का घर और सेवक का सहयोग राजन के लिए सबसे सुरक्षित आश्रय बनते हैं। बहिन / बहनोई द्वारा दिए गए ₹200 केवल पैसे नहीं, बल्कि भाई के प्रति उनका मूक समर्थन और अटूट विश्वास थे, जो आगे चलकर राजन को उसके जीवन के नए ‘कर्मफल’ को प्राप्त करने की ऊर्जा देते हैं।
एक सप्ताह के भीतर जब राजन अपने घर वापस आया तो पूरे मोहल्ले वालों ने उसका खूब मज़ाक उड़ाया – बोले – देखो लाट (लॉर्ड) साब अब एस पी बनने के लिए आरक्षक की नोकरी छोड़ आए हैं। माँ और पिता भी ताने सुनकर परेशान थे,,, बताओ कोई वर्दी वाली नोकरी छोड़ता है ? राजन आज लोगों नहीं,, आसमान को देख रहा है। उसको पूरा भरोसा था कि उसका कर्म अच्छा है तो फल भी अच्छा मिलेगा।
(आगे की सच्चाई कल)






