अदिती कुशवाहा बैकुण्ठपुर (कोरिया) छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
एक पिता के दर्द का एहसास………..
(कल्पना कीजिए: शाम का समय है, पिताजी सोफे पर बैठकर अपने बेटे का इंतजार करते हैं और जब बेटा घर आता है तो पिताजी उनसे बातें करने का बहाना ढूंढते है, लेकिन बेटा जो अपना दिन भर का थकान का सारा गुस्सा पिताजी पर निकाल देते हैं और उसके पश्चात पिताजी मायूस होकर छतपर चले जाते हैं, और कुर्सी पर बैठ कर उस चांद को अपना बेटा समझकर। निहारते हुए कहते हैं…………)
आँखों में चश्मा है, दूर का दिखता नहीं,
ये खून का रिश्ता है, कभी बदल सकता नहीं।
तू मुझे अपना कहने से थकता नहीं,
मैं पिता हूँ तेरा, ये रिश्ता कभी मिट सकता नहीं।
बात अलग है कि तू समझता नहीं,
ये खून का रिश्ता है, पानी बन सकता नहीं।
(पिताजी अपने हृदय को थाम कर गहरी सांस लते हैं, और फिर वे उन पलों को याद करते हैं, कि कैसे जब वे। तपती धूप, बरसातऔर ठंड में भी काम करके आते थे तो, अपने बच्चों को देख कर जैसे ही गले लगाते थे तो सारा दर्द थकान भूल जाते थे, लेकिन अब उनके साथ वो पल नहीं आता तो पिता जी कहते हैं…..)
गंदा है तालाब, तो इसमें मछली का क्या कसूर?
मैं सोचता हूँ घंटों,
वक़्त तेरे पास नहीं,
तो इसमें मेरा क्या कसूर?
(कुछ देर तक उस चांद को देखते ही देखते पिता जी कहते हैं….)
मैं जानता हूँ,
दिया मैंने सब कुछ तुझे,
अपनी रूह को तड़पाकर,
पर तू लौटाएगा नहीं वापस मुझे।
वह खुशियाँ जो अब तक मैंने तुझको दिया,
अरे, बाप की कभी फटी कमीज़ भी देख लेता,
तो वह चार वक़्त की रोटी भी याद कर लेता,
जिसे मैं तेरे लिए खून-पसीने एक करके
पहला निवाला भी तुझे ही खिलाया था।
बात अलग है, मैंने कभी जताया नहीं,
भटक न जाए जिंदगी में कभी,
इसलिए ज्यादा प्यार लुटाते कभी दिखाया नहीं।
(पिता जी रो पड़ते हैं.. और फिर प्यार भरी नजरों से चांद को देखते हुए कहते हैं…..)
बाप हूँ न, इसलिए व्यवहार में थोड़ा सख़्ती दिखाया था।
तू चाहे कर ले नफरत जितनी मुझसे,
बचपन में पहला प्यार तो तुमने मुझसे ही किया था।
तेरी कितनी गलतियों को मैंने माफ भी किया था।
फिर..
क्यों बरसता है मुझ पर, मेरे आँसुओं को देखकर?
याद तो है ना तुझे, बचपन में कई दफ़ा
तेरे आँसुओं को पोंछकर तुझे हँसाया था।
(अब पिता जी बेटे के बदलते स्वभाव को याद करते हुए सोचते हैं…..)
एक पल सोचता हूँ,
आज घर के अंदर हूँ,
कल खुद के घर से ही बाहर कर दिया जाऊँगा।
आज वक्त नहीं है तेरे पास,
पास बैठकर समय बिताने के लिए,
तो कल कहीं सड़कों पर नजर आऊँगा।
तू अपना है ना, फिर भी तुझे गुनहगार नहीं ठहराऊँगा।
आखिरी साँसों तक मैं अपना रिश्ता जरूर निभाऊँगा
बस इंतजार है मुझे उस काले समय की
जिसे मैं नहीं देखना चाहता,….
(पिता जी आंसू पोंछ कर थोड़ा व्यवस्थित होकर कहते हैं….. )
खून के रिश्ते में कितना पानी है,
ये तो वक्त ही बताएगा।
तू संभल जा, बेटा, वरना
परिवर्तन का वह दौर
फिर कभी न कभी जरूर आएगा।
तेरी वजह से मेरी आंखों में आंसू आयेगा
फिर भी मेरी आंसुओं को देख कर
तू मूझ पर ही चिल्लाएगा,
अंत में….
तू बेटा नहीं, खुदगर्ज कहलाएगा।…….
निष्कर्ष: आशा है! आप सभी को मेरी छोटी सी कविता पसंद आई होगी। जो मैंने एक पिता के दर्द के अहसास को महसूस करके लिखा है, कि जब हम उनकी संतान होने के बावजूद उनके उम्र के आखिरी पड़ाव पर उनसे जब ऐसा व्यवहार करते हैं तो उनके हृदय को कितनी ज्यादा चोट पहुंचती हैं। और हम उन्हें अनदेखा कर देते हैं……..।)






