राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
“कर्मफल”
(उपन्यास भाग 20)
राजन का चयन मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा पूर्व प्रशिक्षण केंद्र, भोपाल में हुआ तो उसके जीवन का एक नया अध्याय शुरू हो गया। तीन वर्ष की कठोर साधना सुबह चार बजे उठना, रात के दस-ग्यारह बजे तक किताबों से जूझना, सिर्फ किताबें ही नहीं, बल्कि अपने अंदर की कमजोरियों से भी लड़ना। केंद्र के छात्रावास में रहने वाले दर्जनों युवा उसके लगन से प्रभावित हुए। लड़के-लड़कियाँ दोनों ही उसकी नियमितता, गंभीरता और चुपचाप मेहनत करने की आदत को देखकर प्रभावित हुए। वह कभी ज़ोर से नहीं बोलता था, लेकिन जब बोलता तो बात में वजन होता था। भूगोल विषय और उसका नक्शा उसके दिमाग में इस तरह बसा था जैसे कोई पुराना मित्र।
उन्हीं दिनों सुमन भी उसी परीक्षा केंद्र में राजन के साथ परीक्षा पूर्व की तैयारी कर रही थी। पहले तो वह सिर्फ एक सहपाठी थी जो चुपचाप नोट्स लेती, कभी-कभी संदेह पूछती। लेकिन धीरे-धीरे राजन का व्यक्तित्व उसके मन में गहरी छाप छोड़ने लगा। उसकी सादगी, उसकी ईमानदारी, और सबसे बढ़कर वह अजीब सी शांति जो उसके चेहरे पर रहती थी ,सुमन को आकर्षित करने लगी। एक दिन उसने साहस करके अपने माता-पिता और भाई-बहन से राजन का परिचय कराया। परिवार ने राजन को देखा सादा कपड़े, साफ़ बोल, और आँखों में एक तरह की चमक । सुमन के पिता ने बाद में पत्नी से कहा था, “इस लड़के में कुछ बात तो है, देखना समय बताएगा।
इसी बीच राजन का चयन उच्च श्रेणी शिक्षक (भूगोल) में हो गया। पोस्टिंग आई,कन्या उच्चतर माध्यमिक शाला, प्रभात पट्टन, बैतूल। समाचार सुनते ही सुमन के परिवार में खुशी की लहर दौड़ गई। सुमन की माँ ने हाथ जोड़कर कहा, “भगवान ने सुना हमारी प्रार्थना को, राजन स्वयं थोड़ा अचंभित था। शिक्षक बनना उसके सपनों में था, लेकिन इतनी जल्दी? फिर भी उसने नियुक्ति पत्र लेकर ड्यूटी को ज्वॉइन कर लिया।
प्रभात पट्टन पहुँचकर राजन ने कक्षाओं में पढ़ाना शुरू किया। लड़कियाँ पहले तो नए मास्टर साहब को लेकर उत्सुक थीं, फिर उनकी गंभीरता और विषय-ज्ञान से प्रभावित होने लगीं। तीन महीने बीत गए। इन तीन महीनों में सुमन और राजन के बीच जो दूरी थी, वह धीरे-धीरे सिमटने लगी। पत्र आते, कभी फोन होता, कभी छोटी-छोटी बातें। सुमन का आकर्षण अब स्पष्ट रूप से प्रेम में बदल चुका था। वह राजन के बारे में सोचती तो दिल में एक अजीब सी गर्माहट फैल जाती। राजन शुरू में सहमा-सा रहता। उम्र का तकाज़ा था या समय का फेर वह स्वयं नहीं समझ पाया। लेकिन सुमन की सादगी, उसकी निष्ठा और उसके परिवार का आत्मीय व्यवहार उसके हृदय की दीवारों को धीरे-धीरे तोड़ने लगा। एक दिन उसने खुद को स्वीकार किया वह भी सुमन के प्रति आकर्षित हो चुका है। प्रेम प्रसंग अब दोनों के जीवन का हिस्सा बन चुका था।
तीन माह बाद एक और मोड़ आया,अपेक्स बैंक मुख्यालय, भोपाल में राजन का चयन हो गया। बैतूल छोड़कर वह फिर भोपाल लौटा और जनवरी 1983 में बैंक कैशियर की ड्यूटी ज्वॉइन कर ली । इस बार मिलना-जुलना पहले से कहीं अधिक सहज हो गया। सुमन के परिवार ने राजन को अपने सरकारी आवास में पेइंग गेस्ट के रूप में रखने का प्रस्ताव रखा। राजन ने विनम्रता से स्वीकार कर लिया। अब दोनों एक ही छत के नीचे थे सुबह की चाय, शाम की तैयारी, और रात के देर तक प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें।
कमरे में दो टेबल लग गईं, एक तरफ राजन बैठता, दूसरी तरफ सुमन। कभी-कभी सुमन कोई कठिन प्रश्न लेकर आती तो राजन धैर्य से समझाता। कभी राजन थक जाता तो सुमन चुपचाप उसके लिए चाय बना लाती। परिवार वाले उन्हें देखकर मुस्कुरा देते। सुमन की माँ कभी-कभी कहती, देखो ! दोनों कैसे लगन से पढ़ रहे हैं। भगवान करे दोनों का भविष्य उज्ज्वल हो।
रात के सन्नाटे में जब किताबें बंद हो जातीं, तो दोनों के मन में अनकही बातें उठतीं। राजन कभी-कभी खिड़की के पास खड़ा होकर बाहर के अँधेरे को देखता रहता। सुमन उसके पीछे से आकर धीरे से पूछती, “क्या सोच रहे हो?” राजन मुस्कुराकर कहता, “सोच रहा हूँ कि कर्मफल सचमुच मिलता है। मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।” सुमन चुपचाप उसके कंधे पर हाथ रख देती। दोनों समझते थे कि उनके बीच जो संबंध बन रहा है, वह सिर्फ प्रेम नहीं, बल्कि एक गहरी साझेदारी है। सपनों की, संघर्ष की, और भविष्य की।
दिन बीतते गए। परीक्षाएँ नज़दीक आती गईं। दोनों की तैयारी और तीव्र हो गई। लेकिन उनके बीच जो भावना थी, वह भी उतनी ही गहरी होती गई, न कोई नाटक, न कोई दिखावा सिर्फ दो युवा दिल, जो कर्म के रास्ते पर एक-दूसरे का साथ पाकर और मजबूत होते जा रहे थे। इसी बैच लोक सेवा आयोग की लिखित परीक्षा का परिणाम आता है।
(शेष भाग कल)







