संजय सोंधी (संयुक्त निदेशक) शिक्षा निदेशालय दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
पटाखों का धुआँ, मिलावट का जायका और दीपावली का ‘विकास’।
दीपावली का पावन पर्व आते ही हमारे चारों ओर उम्मीदों के दिए कम और महंगाई के रॉकेट ज्यादा जगमगाने लगते हैं, जहाँ हर जेब फटने को बेताब रहती है और फेफड़े खुद को भगवान भरोसे छोड़ देते हैं। बाजारों में दीये कम, मिलावट की ऐसी आतिशबाजी सजती है कि खोया-खोवा और मावे की मिठाइयों में असली चीज ढूँढने के लिए डीएनए टेस्ट किट की नहीं, बल्कि सीबीआई जाँच की जरूरत पड़ जाती है, क्योंकि यहाँ दूध से लेकर पनीर तक सब कुछ बिना गाय-भैंस के सीधे केमिकल कारखानों से छनकर आ रहा है। प्रशासन भी अपनी नींद से जागकर ऐसे छापे मारता है जैसे किसी खूखांर आतंकवादी को पकड़ रहा हो, और पकड़े जाने पर दुकानदार ऐसे निर्दोष चेहरा बनाते हैं मानो वे मिलावट नहीं बल्कि समाजसेवा का कोई गुप्त यज्ञ कर रहे हों। फिर भी हमारे पर्यावरण प्रेमियों का दिल तब पिघलता है जब वे ‘ग्रीन पटाखे’ खरीदने के बजाय ऐसे कानफाड़ बम फोड़ते हैं जिनसे आसपास के बुजुर्गों की धड़कनें और कुत्तों की चीखें एक साथ आसमान छूने लगती हैं। महंगाई के इस दौर में तेल और चीनी के भाव आसमान छू रहे हैं, लेकिन फिर भी लोग अपनी शान दिखाने के लिए इतना बारूद फूँक देते हैं कि पड़ोसी के घर में दीया जले न जले, पूरा मोहल्ला गैस चैंबर जरूर बन जाता है। इस प्रकाश पर्व पर हम अंधेरे को मिटाने चले थे, लेकिन विडंबना यह है कि हमने दीयों की लौ को तो साइड में रख दिया है और अपने फेफड़ों में जहरीला धुआँ और पेट में सिंथेटिक जहर भरकर खुशी से झूम रहे हैं।






