राजेन्द्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत जेल अधीक्षक) बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
कर्मफल (भाग 23)
नेक कर्मों की राह पर चलते हुए भी, राजन का मन अक्सर विचारों के भंवर में डूब जाता था। समाज की बदलती आबोहवा उसे भीतर तक झकझोर देती। वह अक्सर गहन चिंतन में डूब जाता कि आज के दौर में आदमी का भला होना या उसका अच्छा चरित्र कोई मायने नहीं रखता; पद, प्रतिष्ठा और पावर ही समाज में प्रगति के असली सूचक बन चुके हैं। अच्छाई और व्यावहारिकता के इसी अंतर्द्वंद्व की ऊहापोह में राजन फंसा हुआ था। इसी बीच, मां के स्नेहिल आदेश को वह टाल न सका। बैंक से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर वह दमोह के लिए रवाना हो गया, जहां उसकी मौसी के छोटे लड़के निरपत की शादी का उत्सव था।
दमोह पहुंचते ही शादी वाले घर की रौनक ने उसे घेर लिया, लेकिन उसके मन की उदासी पूरी तरह गायब नहीं हुई थी। इसी दौरान वहां मास्टर टीकाराम जी से उसकी भेंट हुई। औपचारिक कुशल-क्षेम के बाद मास्टर जी ने बात का रुख मोड़ा और बोले, “राजन बेटा, मेरे दामाद की बेटी है सज्जो। अभी-अभी ग्यारहवीं की परीक्षा पास की है उसने। संयोग से इन दिनों वह भी दमोह आई हुई है। मेरी मानो तो एक बार लड़की देख लो, अगर पसंद आ जाए तो बात आगे बढ़ाएं।” राजन ने अपनी वर्तमान मानसिक स्थिति को देखते हुए दुखी मन से, लेकिन पूरी शालीनता से मना कर दिया, “मास्टर जी, अभी मैं शादी के बंधन में बंधने के लिए तैयार नहीं हूं।
अगली सुबह, जब सूरज की किरणें आंगन में बिखर रही थीं, राजन शादी वाले घर के बाहर खड़ा नीम की दातौन घिस रहा था। तभी एक अनजान सज्जन वहां आए। राजन को अकेला खड़ा देख उन्होंने सीधे उसी से पूछा, “जी , मैं यहां बैंक वाले राजन साहब से मिलने आया हूं, क्या आप बता सकते हैं वो कहां मिलेंगे?
राजन ने थोड़ा अचरज से मुस्कुराते हुए कहा, “जी, मैं ही राजन हूं। कहिए, क्या काम है?
आगंतुक के चेहरे पर एक संतोषभरी मुस्कान तैर गई, उन्होंने बिना देर किए अपने रुमाल में बंधे हुए एक श्रीफल (नारियल) को राजन के हाथों में थमा दिया और जेब से 101 रुपये निकाल कर सगुन के रूप में उसके हाथ पर रख दिए। राजन हक्का-बक्का रह गया। आगंतुक बड़े आत्मीय स्वर में बोले, “दरअसल, मेरे काका ससुर (मास्टर टीकाराम जी) ने कल रात आपको देख लिया था और उन्हें आप बहुत पसंद आ गए। आज मैंने भी आपको देख लिया और मुझे भी आप बहुत जंचे हैं । मेरी बेटी सज्जो को आज आप देख लीजिए, अगर आपको पसंद आ जाए तो रिश्ता पक्का समझिए।
वहां पास ही राजन के भाई देवी और मौसा जी भी खड़े थे। इस तरह अचानक और अनोखे अंदाज में आए रिश्ते को देखकर दोनों अवाक रह गए और फिर मुस्कुराने लगे। राजन को समझ नहीं आ रहा था कि इस अनपेक्षित आदर और सगुन पर क्या प्रतिक्रिया दे। दुपट्टों और वंदनवारों से सजे उस माहौल में देखते-देखते दोपहर के एक बज गए। तय कार्यक्रम के अनुसार, सज्जो को देखने की बात आगे बढ़ी। पड़ोस के ही एक घर में सज्जो के मामा हरिशंकर जी की बारात आई हुई थी। उसी घर की बैठक में दोनों परिवारों के मिलने का इंतजाम किया गया। सज्जो अपने मनोहर मौसा जी के साथ कदम बढ़ाती हुई उस बैठक में दाखिल हुई।
जैसे ही राजन और सज्जो की नजरें एक-दूसरे से मिलीं, कमरे में पसरी हिचकिचाहट पल भर में हवा हो गई। राजन ने देखा कि सामने सादगी और शालीनता की मूरत खड़ी है। सज्जो की मासूम खूबसूरती और उसकी आंखों की चमक ने राजन के उदास मन को झकझोर कर रख दिया। वहीं दूसरी ओर, सज्जो ने जब राजन को देखा, तो उसे उसकी आंखों में एक ठहराव, सच्चाई और अनूठी सादगी नजर आई। समाज के आडंबरों से दूर, राजन का यह सीधा और सुलझा हुआ व्यक्तित्व सज्जो के दिल को छू गया।
दोनों के चेहरों पर एक अनकही खुशी और लाजभरी मुस्कान तैर गई। जो राजन कल तक शादी के नाम से पीछे हट रहा था, वह आज सज्जो के आकर्षण में बंध चुका था, और सज्जो भी राजन की सादगी पर रीझ गई थी। दोनों के दिलों ने बिना कुछ कहे ही एक-दूसरे को स्वीकार कर लिया था, और बैठक में मौजूद बड़े-बुजुर्ग इस मौन रजामंदी को देखकर भीतर ही भीतर निहाल हो कर कोको कोला की डकार ले रहे हैं।
राजन ने लड़की का नाम और नाम का अर्थ पूछा ? सज्जो ने शरमाते हुए , ,, सही बताया ,,उपस्थित दोनों पक्ष के रिश्तेदार ,,ताली बजाते,, कि सज्जो ने पूछा- आप ठीक हो ? राजन बोला – अभी तक तो ठीक हूँ,,
(शेष भाग कल)






