डॉ० रामबली मिश्र, वाराणसी।
श्री मानस चालीसा
दोहा
अतिशय चंचल मन सदा, भूल गया विश्राम।
फ़ितरत में ही यह रहे, नहीं राम का नाम।।
अति लौकिक- भौतिक दिखे, सत्य विषय प्रिय भोग।
काम वासना ही प्रमुख, यही प्रबल है रोग।।
चौपाई
अति कामी क्रोधी दुष्कर्मी।
पाप परायण स्वयं अधर्मी।।
है विश्वास सदा काया में।
हरदम लगा हुआ माया में।।
मिथ्या सहज हमेशा लगती।
लिप्सा जीवित सदैव रहती।।
लौकिक इच्छा सहज प्रबल है।
तृष्णा का व्यापार सबल है।।
द्वंद्व छिड़ा प्रति छड़ रहता है।
दुस्साहस हर पल दिखता है।।
इसको सबकुछ सम्भव लगता।
पाने को नित उद्यत रहता।।
खुद को परम सशक्त समझता।
अहंकार में चूर मचलता।।
नहीं किसी को घास डालता।
मुंह को चारोंओर मारता।।
भीतर दूषित भाव भरा है। भाग रहा मन सहज हरा है।।
कैसे होगा जग का वंदन।
कभी नहीं पावन अभिनंदन।।
शुद्ध आचरण फीका लगता।
दोष भाव मधु मीठा लगता।।
ईर्ष्या का भंडार भरा है।
कुटिल द्वेष शातिर गहरा है।।
जिंदा कायरता रहती है।
धूमिल बातें ही कहती है।।
दुख पहुँचाना ही मकसद है।
जहर खिलान सदा मदद है।।
यह स्वच्छंद भोग रस चाहत।
करे लक्ष्य को निश्चित आहत।।
इसमें भरा हुआ है कचरा।
में में करता जैसे बकरा।।
बुद्धि नहीं है केवल तन है।
जिसकी खातिर केवल मन है।।
सद्विवेक जब जागे उर में।
शुभद चेतना अन्तःपुर में।।
मन का होता तब निरोध है।
होने लगता सहज बोध है।।
मन- मानस निर्मल बन जाता।
चित्त योग का वृक्ष उगाता।।
दोहा
होता मन को ज्ञान जब, हो जाता वह भंग।
चढ़ जाता उस पर अखिल, आध्यात्मिक शिव रंग।।
अथ श्री मानस चालीसा
डॉ० रामबली मिश्र वाराणसी।
विश्वासघात
विश्वासघाती सदा पापकर्मी।
गाली स्वयं वह सदा नीचकर्मी।।
संघ्या बना रात्रि का वह तिमिर है।
पीता सदा घात करके रुधिर है।
प्यारा नहीं है कभी मानवोचित।
व्यापक नहीं तुच्छ काया यथोचित।
सारा जमाना उसे गालियाँ दे।
फिर भी कुकर्मी सहज तालियाँ ले।
कौरव बना सिर उठाता रहेगा।
बेशर्म ऐंठन दिखाता चलेगा।
गाड़ी चलता बहुत वेग से है।
ठेंगा दिखाता सदा प्रेम से है।
बोले सदा स्नेह से वाण मारे।
होता किसी का नहीं जीर्ण न्यारे।
नैया चलाता डुबाता पथिक को।
दिल का नकारा रुलाता व्यथित को।
डॉक्टर रामबली मिश्र वाराणसी।
आशाओं का दीप
घर-घर दीप जलाएँगे हम।
खुशियाँ सदा मनाएँगे हम।
नहीं बुझेगा दीप कभी भी।
इसे सदा चमकाएँगे हम।
कभी नहीं त्यागेंगे आशा।
बोलेंगे प्रिय मधुरिम भाषा।
जग को स्वर्ग बनाएँगे हम।
चढ़ते जाएँगे आकाशा।
दीप दिखाते चला करेंगे।
मानवता का भला करेंगे।
नहीं रहेंगे दीप बिना हम।
जगती से हम मिला करेंगे।
उम्मीदों पर कायम जग है।
सुंदर भाव मुलायम पग है।
वर्तमान है शुभद कर्म पर।
आधारित मोहक रग- रग है।







