मैंने जूता जो उछाला तो …

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डा. सुधाकर आशावादी

 

 

 

                           व्यंग्य

 

        मैंने जूता जो उछाला तो …

 

एक समय था, कि जब जूतम पैजार बड़ी हवेली में अधिक हुआ करती थी। जूते अधिक महंगे नहीं हुआ करते थे, तो पहनने के साथ साथ एक दूसरे पर उछालने के लिए उनका खूब प्रयोग होता था। अब जूता उछालने की नौबत आसानी से नहीं आती। यदि कभी कभार किसी ने किसी सभा में जूता उछाल भी दिया, तो वह केवल दिखावा भर रह जाता है, प्रचार पाने तक सीमित रह जाता है। एक समय था, कि जब विचारक से लेकर साहित्यकार तक सभी शब्दों में जूतों के प्रतीक का भरपूर प्रयोग करते थे। जितना जूते मारने से कष्ट न पहुंचे, उससे अधिक पीड़ा अपने शब्दों से ही दुश्मन को पहुँचाते थे। चर्चा होती थी, कि अमुक साहित्यकार या अमुक विचारक ने अमुक व्यक्ति को जूते से भिगो भिगो कर मारा है। यह समझ नहीं आता था, कि जूते को पानी से भिगोकर प्रहार किया गया है या व्यक्ति को पहले पानी से भिगोया गया है, तदुपरांत शब्दों के जूतों से उसकी पिटाई की गई है।

बहरहाल जूता पर्याय है, किसी के अपमान का, किसी के मान की हानि का। यूँ तो जूते घर में, गलियों में, बाजार में, सड़कों पर यदा कदा उछलते ही रहते हैं। कभी कोई नवयौवना किसी मनचले पर उछालती है, कभी क्रोध से लबालब कोई शख्स किसी दूसरे शख्स पर। हर जगह जूते का असर एक सा नहीं होता।

सवाल है कि जूता कहाँ और किस पर निशाना साधते हुए उछाला गया। चुनाव प्रचार में मतदाताओं के द्वार पर जब कोई नेता वोट मांगने जाता है, तो नाराज मतदाता उस पर जूता उछालने में संकोच नहीं करता। गरिमा जूते की नहीं होती, गरिमा उसकी होती है, जिस पर जूता उछाला जाता है। साहित्यकार शब्दों के जूतों का भले ही कितना भी प्रयोग करें, किन्तु वे जूते भी प्रतीकों के माध्यम से उछालते है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब कोई बुद्धिजीवी प्रत्यक्ष रूप से जूता उछालता है। तनिक से आवेश में आकर वह जूता उछाल तो देता है, बाद में उसे पता चलता है, कि उसके जूते की मारक क्षमता कितनी है। वैसे लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की दुहाई बात बात में दी जाती है। कोई किसी की भावनाएं आहत करे, तो उस पर कठोर कार्यवाही इसलिए नहीं की जाती, कि अभिव्यक्ति की आजादी पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। जूते उछालने वाले भी जूता उछालने को अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ लेते हैं। यही से बहस शुरू हो जाती है।

एक जूता उछलते ही अनेक किस्से कहानियां उछलने लगते हैं। भले ही जूता निशाने से चूक जाए, लेकिन उसे ऐसे दर्शाया जाता है, कि जैसे किसी आतंकी ने बड़ा हमला कर दिया हो। जूता नहीं ए. के. 47 की तरह जानलेवा अस्त्र चला दिया गया हो। बहरहाल एक बुद्धिजीवी कहे जाने वाले शख्स ने किसी बड़े बुद्धिजीवी कहे जाने वाले शख्स की हवेली में जूता उछाला। जूता कितनी ऊंचाई तक उछला, कहाँ गिरा, किसी के लगा या नहीं लगा, इस पर कोई चर्चा न होनी थी न हुई, किन्तु हंगामा हो गया। जूते के समर्थन व विरोध में अनेक स्वर उभरने लगे। किसी ने जूते को सामंतवाद का प्रतीक बताया, किसी ने घृणा का। किसी ने अन्याय के विरूद्ध बताया, किसी ने न्याय के विरुद्ध। ऐसे में जूता स्वयं भी कुछ नहीं समझ पा रहा है, कि वह पैरों का रक्षा कवच है या किसी के मान को क्षति पहुँचाने के लिए प्रयोग में लाया जाने वाला कोई हथियार ?   (विनायक फीचर्स)

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