स्वर्ण दीपों का नगर    

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कहानीकार – संजय सोंधी

(संयुक्त सचिव भूमि एवं भवन विभाग)

दिल्ली सरकार

 

 

                      स्वर्ण दीपों का नगर    

 

                      (नया अध्याय, देहरादून)

 

संध्या का समय था। विजयनगर की गलियाँ चमचमा रही थीं। चारों ओर दीपों की रौशनी, फूलों की महक और मिठाइयों की सुगंध हवा में घुली थी। समृद्ध साम्राज्य के राजा श्रीकृष्णदेव राय के शासनकाल में दीपावली का उत्सव अपने चरम पर था।

 

नगर के प्रसिद्ध व्यापारी संजय अपने घर को सजा रहे थे। उनकी पत्नी लक्ष्मी आँगन में रंगोली बना रही थीं, और दोनों बच्चे — राजशेखर और विजयलक्ष्मी — उत्साह से दीपों की कतारें लगा रहे थे। लक्ष्मी ने मुस्कराते हुए कहा, “आज का दिन शुभ है, कहा जाता है कि जितने दीप जलाओगे, उतनी ही समृद्धि घर आएगी।” छोटे राजशेखर ने मासूमियत से पूछा, “माँ, क्या भगवान भी हमारे दीप देखने आएँगे?” संजय ने हँसते हुए कहा, “बिलकुल, बेटा! आज तो स्वयं देवी लक्ष्मी हर घर में प्रवेश करती हैं।”

 

संध्या होते ही समूचा विजयनगर सुनहरी आभा में नहा गया। महलों की दीवारों पर दीपों की कतारें जड़ी थीं, मंदिरों में शंख बज रहे थे और सड़कों पर सुगंधित धूप की लहरें फैल रही थीं। इसी बीच राजदरबार में भव्य आयोजन चल रहा था। राजा कृष्णदेव राय स्वर्ण वस्त्रों में सुसज्जित थे। दरबार में अष्ट दिग्गज कवि, नर्तकियाँ, और दूर-दराज़ के व्यापारी एकत्र थे।

 

संजय भी अपने रेशमी वस्त्रों और उपहारों के साथ दरबार पहुँचे। उन्होंने सम्राट को अपनी बनायी उत्कृष्ट रेशमी साड़ियों का उपहार दिया। राजा अत्यंत प्रसन्न हुए। तभी दरबार के विदूषक तेनालीराम मुस्कराए और बोले, “महाराज! संजय की रेशम तो अद्भुत है, पर सुना है उनकी पत्नी लक्ष्मी के दीपों की रौशनी भी सोने को मात दे देती है!” दरबार में ठहाके गूंज उठे। राजा ने हँसते हुए कहा, “तो फिर आज रात हम उन्हीं दीपों से अपने महल को सजवाएँगे!”

 

आदेश मिलते ही सैनिकों ने संजय के घर से सैकड़ों दीप लाकर महल की दीवारों पर सजा दिए। जैसे ही सभी दीप एक साथ प्रज्वलित हुए, पूरा महल सूर्य समान चमक उठा। तेनालीराम ने आँखें मिचकाते हुए कहा, “अब तो खुद चाँद भी शर्मा जाए, महाराज!” राजा और दरबारियों की हँसी चारों ओर गूँज उठी।

 

रात्रि के अंतिम प्रहर में राजा ने आकाशदीप उड़वाए। सैकड़ों दीपक

 आसमान में तैरने लगे, मानो तारों की बारिश हो रही हो। 

 

रात ढलने लगी। संजय अपने परिवार के साथ नदी किनारे दीप प्रवाहित करने पहुँचे। जल पर तैरते दीपों की पंक्तियाँ मानो विजयनगर की समृद्धि का प्रतीक थीं। संजय ने बच्चों से कहा, “देखो, आज हमारा नगर स्वयं एक दीप बन गया है — जो संसार को प्रकाश दे रहा है।”

 

और उस रात, विजयनगर सचमुच “स्वर्ण दीपों का नगर” बन गया — जहाँ भक्ति, वैभव और आनंद एक साथ झिलमिला रहे थे।

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