“आत्मन्! तनिक ठहरकर तो देखो।”

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सम्पादक (उ. प्र.): दार्शनिक कविवर सूर्य

आध्यात्मिक चिन्तक,

साहित्यकार, मानवतावादी।

(नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

      “आत्मन्! तनिक ठहरकर तो देखो।”

      —————————————

 

इसी क्षण, इसी स्थान पर।

तनिक ठहरकर तो देखो!

इस अस्तित्व की गहराई में,

उतरकर तो देखो!

सूर्य’ को अपनी चेतना के क्षितिज पर,

उदित होते देखो।

धरा के मौन सौंदर्य—

उन ‘पुष्पों’—की ओर

दृष्टिपात करो! व 

मुक्त ‘पक्षियों’ के कलरव को,

अपने अस्तित्व के राग में घुलने दो। 

यही वह ‘स्वर्ग’ है— 

वह परम धाम—

जहाँ तुम्हें प्रकृति ने 

स्वयं स्थापित किया।

जहाँ तुम विद्यमान हो। 

मौन होकर तो देखो!

इन्हें इस क्रूर, मर्मरहित संसार के

मायाजाल में मत खोजो!

जहाँ केवल भ्रम का कोलाहल है;

और न ही, हे आत्मन् !

भविष्य के किसी भी कालखंड में,

उस मिथ्या मृगतृष्णा के पीछे भटकना।

 हे आत्मन्! यह जीवन, 

जिसे तुम केवल एक 

चलता-फिरता, क्षणभंगुर काया

 मानते आए हो,

उसे अब चेतना के अमृत से,

 ताज़ा तथा सुन्दर बना लो।

अपने हृदय के मरुस्थल में,

प्रेम व करुणा के पुष्प खिला लो;

फिर देखो, 

यह संपूर्ण अस्तित्व हर दृष्टि से, 

हर हाल में,सुन्दर ही सुन्दर है।

यह चेतना का शाश्वत सत्य है।

मेरी दिव्य दृष्टि का मौन आह्वान;

तुम्हारे ही हृदय के मौन कुंज में।

वह परम प्रकाश प्रतीक्षित।

 

 

“भारतीय संस्कृति के रक्षक, सामाजिक समानता एवं एकता के प्रतीक”-

 

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