तेलुगु मूल: डॉ.वासाला वरप्रसाद
(हिन्दी सह आचार्य)
शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय (स्वायत्त) जगित्याल, तेलंगाना।
हिन्दी अनुवाद: डॉ. यल.कोमुरा रेड्डी
(हिन्दी सहायक आचार्य)
एस.आर.आर. शासकीय कला एवं विज्ञान महाविद्यालय
करीम नगर, तेलंगाना।
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
माँ की यादों की बरसात !
तेरे बिना की इस सुबह को
मैं अब स्वीकार नहीं कर पा रहा हूँ माँ..!
रसोई के चिराग़ अब रौशन तो बहुत हैं,
पर तेरी मीठी आवाज़ कहीं खो गई है माँ..!
बचपन में जिस तरह तुम मुझे पुकारती थीं,
वही पुकार आज घर की दीवारों में गूँज रही है।
तुम्हारे प्रेम ने जिस चेहरे को छुआ था,
वह तुम्हारी ममतामयी स्पर्श की प्रतीक्षा में है..!
“कैसे हो बेटा ? क्या खाया तुमने ?”
शीतलता पहुँचाने वाले तुम्हारे ये शब्द..!
त्योहारों पर जब मैं घर आता था,
“कितने दुबले हो गए हो” कहती
तुम्हारी वो फिक्र से भरी नज़रें..!
आज वही यादें मेरे हृदय को भिगो रही हैं..!!
बचपन में स्कूल जाने से पहले,
तुम्हारी मुस्कान आशीर्वाद की तरह मिलती थी।
दुख की इस अंधेरी रात में प्रकाश बाँटकर,
वही मुस्कान आज मुझे रास्ता दिखा रही है..!
बीमारियों से घिरी इस वृद्धावस्था से,
तिलमिलाकर तुम सदा के लिए मौन हो गईं।
अब तुम्हारी चिता की अग्नि में
सब कुछ समर्पित हो गया,
पर उसकी राख गर्म गोद की तरह धरती पर बिछ गई,
और जब मेरा यह बुरा वक्त आया,
तो उसी राख ने मुझे गले लगा लिया।
अब जैसे-जैसे दिन बीत रहे हैं,
वही राख तुम्हारी यादों की वर्षा बनकर,
मुझ पर बरसती है और ढा़ढस बँधाती है..!
माँ… मैं जानता हूँ कि
तुम मुझे छोड़कर कहीं नहीं गई हो,
मेरी हर सांस में तुम आज भी
एक ‘लोरी’ बनकर बसती हो..!!







