युगपुरुष कविवर ‘सूर्य’
(नया अध्याय, देहरादून)
‘नजर का नजरिया’
सुन्दर तथा सहज होकर!
ग़र!
तुम्हारी एक नजर पड़ जाए,
तो यह जीवन!
क्षण भर में,
सुन्दर हो उठता है।
इसमें फिर कोई बोझ नहीं रहता,
कोई गूँजती हुई गम्भीरता नहीं बचती,
बस,
एक निर्मल प्रवाह रह जाता है।
बातों को मुट्ठियों में,
भींचकर मत रखा करो…
वे बातें जो काँच की तरह चुभती हैं,
जो भीतर तक गहरा दर्द देती हैं,
उन्हें बस… भूल जाओ।
उन पर ध्यान देना छोड़ दो,
जैसे पतझड़ में वृक्ष
पुराने पत्तों को छोड़ देते हैं।
छोड़ दोगे, तो हल्के हो जाओगे,
भूल जाओगे, तो जी पाओगे।







