खामोशी का मौका भी मुनादी भी.

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राजकुमार कुम्भज

जवाहरमार्ग, इन्दौर,

 

 

                  (नया अध्याय, देहरादून)

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खामोशी का मौका भी मुनादी भी.

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खामोशी का मौक़ा भी मुनादी भी

देश-दुनिया में ताजा-ताजा कब्जा करता 

राष्ट्राध्यक्षों का अपहरण करता 

सीने पर बंदूक तानता,भीख माॅंगता

नोबेल दे दो,नोबेल दे दो 

है बली बहुत मगर छली अद्वितीय 

बिना बुलाये कहीं भी घुस जाता

भटकता-भटकाता… उलझता-उलझाता

हा हा करता,हाथ हिलाता, आँखें दिखाता 

खुद को अकेला पाता,सुरक्षा-घेरों में 

मटक-मटककर सुरक्षित मचलता 

खुद ही खुद के प्रिय-अप्रिय नारे लगवाता

अन्नदाता-अन्नदाता, जिंदाबाद-जिंदाबाद 

वह जो तन-मन-जीवन से यौनरोगी

वैश्यागामी, कपटी, विश्व-गुंडा कौन है 

बोले ढक्कनछाप विश्व-गुरू असत्यश्री

काका मेरा काका अमेरिका

ट्रम्पम् शरणम् गच्छामि

बम्बम् शरणम् गच्छामि 

मौक़ा भी, मुनादी भी, खामोशी भी 

ओम् शांति.

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झूलते हुए झूलता हूँ झूला.

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झूलते हुए झूलता हूँ झूला 

कुछ देर इधर, कुछ देर उधर हूँ मैं 

कुछ देर बीच में किन्तु ठहरता नहीं हूँ

बीच में रहते हैं जो भी, अभी या कभी भी 

जरा-जरा भी पाते नहीं हैं ठौर-ठिकाना 

ठीक नहीं, दोनों तरफ वफादारी ठीक नहीं 

इस तरफ या उस तरफ़ हो जाना ही ठीक 

युद्ध का वक्त है यही और सही-सही  

बदलना औजार और उपस्थिति ठीक नहीं 

अपनो में रहने से ही होता हूँ मुक्त

अपनो में मरने से ही मिलती है मुक्ति 

मुक्तिबोध मुक्तिमार्ग संभावना है अब भी 

जँगल-जँगल झरते हैं झरने झर-झर

खिलते हैं फूल भी खुशबूदार.

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