राजेंद्र रंजन गायकवाड़
(सेवा निवृत केन्द्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
होना था जो हो गया, खुलीं आंखों से सो गया,
बरबस याद में उसकी, जी भरकर रो गया।
जो लम्हा चुरा लिया था, जालिम दुनियां से,
साये जैसा था, वो भी मुझ से जुदा हो गया।
ख़ुशी थी जो कभी मेरी, अब आह बन गई,
हर साँस में प्यार के दर्द का, बीज बो गया।
कभी मिलने की आस थी, अब बस याद है,
चाहत में साथ चला था, आज दफा हो गया।
चला गया दूर कहीं वो, मैं ठगा सा देखता रहा,
साथ चलना था उसे, आशियां पाकर सो गया।







