डॉ0 हरि नाथ मिश्र, अयोध्या
(नया अध्याय, देहरादून)
दोहे
जले पराली हो धुआँ, संकट हो घनघोर।
चलना दूभर हो गया, संध्या अथवा भोर।।
करे प्रदूषित वायु को, वाहन की भरमार।
दमघोंटू वातावरण, उपजे रोग-विकार।।
आज प्रदूषण से मचा, कोलाहल चहुँ-ओर।
करें नियंत्रित मिल सभी, देकर इस पर जोर।।
वृक्ष कटे, जंगल घटे, हुआ प्रदूषित नीर।
जीवन संकट से घिरा, हरे कौन अब पीर??
भौतिकवादी सोच तो, होती घातक मीत।
इसे त्याग सुख से भरे, रहा कलश जो रीत।।
साधन से सुविधा बढ़े, हो जग सुख-संपन्न।
अवनि बढ़ा निज शक्ति दे, प्रचुर फूल-फल-अन्न।।
जीवन जीएँ संयमित, तभी मिले सुख-चैन।
सदा आसुरी रीति ही, छीने सुख दिन-रैन।।
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विरह-व्यथा
तुम न पास तो सच यह मानो,
मन मेरा घबराता है।
जब-जब यादें तेरी आतीं,
कष्ट और गहराता है।।
तेरे संग बिताईं रातें,
रह-रह बहुत सतातीं हैं।
मधुर मिलन की मीठी बातें,
हिय में आग लगातीं हैं।
जब से छूटा साथ तुम्हारा,
नहीं जगत यह भाता है।।
कष्ट और गहराता है।।
भाती नहीं रौशनी शशि की,
दिनकर भी धूमिल लगता।
हरी-भरी इस धरती का भी,
रंग नहीं मुझको जँचता।
ओज नहीं लहरों में लगता,
सागर जो लहराता है।।
कष्ट और गहराता है।।
भौंरों का गुंजन भी चुभता,
जैसे तीर धँसे हिय में।
फूलों की मादकता फीकी,
जैसे गंध नहीं उनमें।
शीतल पवन अगन यूँ बनकर,
मानो हिय सुलगाता है।।
कष्ट और गहराता है।।
आ जा प्रियवर पास हमारे,
अब तेरे बिन रह न सकूँ।
कोई नहीं सहारा मेरा,
गुजर मैं कैसे कर सकूँ?
मेरी विरह-व्यथा को लख कर,
मौसम ढोल बजाता है।।
कष्ट और गहराता है।







