राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
हाँ, ये भी तुम्हारी जीत है
दिल से पूछो, जरा चुपके से।
जब दुनिया तालियाँ बजाती है,
तब अक्सर दिल रोता है अकेले में
जीत वो नहीं जो चुनाव जिताए
अपने नाम को अखबारों में चमकाएं
जीत वो है जो रातों की नींद लौटाए,
जिसके बाद चेतन मन शांत हो जाए।
जब लड़ते-लड़ते थक गए हो तुम,
कभी किसी टूटे दिल को जोड़ा?
जो हारकर भी मुस्कुरा सके,
तो समझ लो, ये भी जीत है बड़ा।
सपनों के पीछे भागते-भागते,
अपने आप को न खो देना कहीं।
पैसे, पद, प्रतिष्ठा सब मिल जाए,
पर अगर आत्मा रोए, तो क्या जीते?
अपने दिल से पूछो हर शाम,
“क्या आज मैंने खुद को जीता?”
अगर जवाब, हाँ में आए एक बार,
तो समझना ये असली जीत है
मसलन हार में भी छुपी होती है जीत,
जिसे आँखें नहीं, दिल ही पहचानता।
खुश रहना सीख लो, छोटी-छोटी बातों में,
बाकी सब तो वक्त के साथ, चला जाता।
तो बोलो, जीत है ना? या हार है?
दिल मुस्कुराए तो जवाब है – हाँ।
बाहर की जंग जीतने से पहले,
अंदर की शांति, जीत लो एक बार।
ये जीत, किसी से छीनी नहीं जाती,
बस तुम्हारे और तुम्हारे दिल के बीच है।
अपने सिद्धांत जीतो, अपने उद्देश्य जीतो,
ताकि दुनिया जय जयकार करे मरने के बाद।







