सुनील कुमार वर्मा
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
सब्र
एक बार शाम की गहराई में सब्र ने उजाले की तलाश शुरू की। उसे जैसे-जैसे उजाला मिलता जा रहा था। वैसे वैसे शाम और गहराती चली जा रही थी। इस प्रकार सब्र को उजाला हमेशा कम पड़ जाता था। फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी और वह खुद के वास्ते आवश्यक उजाले की तलाश करता रहा। शाम धीरे धीरे और भी गहराते हुए रात में तब्दील होने लगी। अब सब्र को उजाले की और भी कमी महसूस होने लगी। इसके बावजूद सब्र के उजाले की तलाश जारी रही। अब रात भी समय के साथ गहरी होने लगी और सब्र को पर्याप्त उजाला मिलना मुश्किल हो गया। सब्र का हौसला अब पस्त होता जा रहा था। वह थकता चला जा रहा था। अंत में उसने निराश होकर उजाले की तलाश बंद करने की सोची। तब रात ने सब्र के कानों में धीरे से कहा।
“सब्र करो,वह देखो उजाले का सूरज अब निकल रहा है सुबह हो रही है।”
सब्र के पास अब पर्याप्त उजाला था।

