सिपाही सोरन सिंह (वीरगति प्राप्त)

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लेखक-हरी राम यादव,  सूबेदार मेजर (आनरेरी), अयोध्या।

 

 

सिपाही सोरन सिंह (वीरगति प्राप्त)

 

सन् 1998 में पाकिस्तान सरकार ने भारत सरकार को विश्वास में लेने के लिए काफी दोस्ताना रुख अपनाया। दोनों देशो के बीच कई समझौते हुए । इसी दोस्ती की आड़ में पाकिस्तान सरकार ने 1999 में सेना को नियंत्रण रेखा पार कराके हमारे देश की ज़मीन पर कब्ज़ा कराने की कोशिश की। पहले पाकिस्तान कहता रहा कि लड़ने वाले सभी उग्रवादी हैं, लेकिन जब 3 मई के बाद भारतीय सेना ने छानबीन शुरू की तो पता चला कि यह सब उग्रवादी नहीं पाकिस्तान की नियमित सेना है। सही जानकारी होते ही घुसपैठियों को खदेड़ने के लिए ऑपरेशन विजय शुरू किया गया।

 

4 जाट रेजिमेंट के शानदार इतिहास को देखते हुए ऑपरेशन विजय (कारगिल) में 121 ब्रिगेड के अधीन शामिल किया गया। इस यूनिट को नियंत्रण रेखा के साथ लगते काक्सर सेक्टर की जिम्मेदारी सौंपी गयी थी । काक्सर सेक्टर की पहाड़ियों पॉइंट 5608, पॉइंट 5605 और पॉइंट 5280 पर दुश्मन कब्जा जमा कर बैठा था। काकसर, कारगिल जिले की द्रास तहसील में एक गाँव है। यह जिला मुख्यालय कारगिल से पश्चिम की ओर 21 किमी और द्रास से 32 किमी की दूरी पर स्थित है। समुद्र तल से काक्सर क्षेत्र की ऊँचाई लगभग 15000 फीट से अधिक है । इसकी पहाड़ियों पर एकदम खड़ी और नुकीली चढ़ाई थी , जहाँ तक पहुंचना बहुत कठिन काम था ।

 

काक्सर सेक्टर में 15000 फीट की औसत ऊँचाई पर स्थित इन तेज धार वाली चोटियाँ पर सामग्री प्रबंधन, परिवहन, और आपूर्ति बहुत चुनौतीपूर्ण थीं । व्यवस्थाओं के बिना हमले की शुरुआत नहीं की जा सकती थी । प्रारंभिक संचालन की योजना 28 जून 1999 को शुरू करने की थी। 28 जून को संचालन की शुरुआत के लिए स्थिति का आकलन करना जरुरी था। इसके लिए कई सर्वेक्षण गश्त की योजना बनाई गई। सिपाही सोरन सिंह 21 जून 1999 को ऐसी ही एक गश्ती दल का हिस्सा थे। गश्ती दल को पाकिस्तानी सेना की उपस्थिति और खतरनाक मौसम दोनों का सामना करना था । गश्त शुरू की गई लेकिन यह गश्ती दल दुश्मन की नजरों में आ गया। ऊंचाई पर बैठे पाकिस्तानी सैनिकों ने इस दल पर तीव्र गोलीबारी करना शुरू कर दिया। सिपाही सोरन सिंह इस भीषण गोलीबारी में गंभीर रूप से घायल हो गए। गहरी चोटों और तीव्र रक्तस्राव के कारण 28 वर्ष की आयु में वह वीरगति को प्राप्त हो गए ।

 

सिपाही सोरन सिंह का जन्म 22 फरवरी 1971 को कृष्ण नगरी मथुरा के गोवर्धन तहसील के गाँव नगरिया में श्रीमती वीरमती देवी श्री अर्जुन सिंह के यहाँ हुआ था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा प्राइमरी पाठशाला पैंठा, हाई स्कूल की शिक्षा उच्चतम माध्यमिक विद्यालय नगला जंगली, तथा इंटरमीडिएट की शिक्षा महात्मा गाँधी इंटर कालेज सौंख से पूरी की और 28 अप्रैल 1990 में सेना की जाट रेजिमेंट में भर्ती हो गए। जाट रेजिमेंटल सेंटर बरेली से अपना प्रशिक्षण पूरा करने के बाद उनकी तैनाती 4 जाट रेजिमेंट में हुई।

 

सिपाही सोरन सिंह पांच भाइयों – ⁠राजू कुंतल, ⁠हरिओम कुंतल, ⁠लक्ष्मण कुंतल, ⁠रूप सिंह कुंतल और एक बहिन ⁠सरोज देवी के परिवार में सबसे बड़े बेटे थे। इनके परिवार में इनके माता-पिता, पत्नी श्रीमती कमलेश देवी, दो बेटे विवेक सिंह, रोहित सिंह और बेटी डॉली सिंह हैं । विवेक सिंह अपने पिता के वीरगति प्राप्त होने के बाद सरकार द्वारा आवंटित की गयी गैस एजेंसी चलते हैं और रोहित सिंह अपने पिता के पद चिन्हों पर चलते हुए भारतीय सेना में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं ।

 

वीर योद्धा सिपाही सोरन सिंह की याद में उनके गांव नगरिया में एक स्मारक का निर्माण श्री छीतरमल (ब्लाक प्रमुख अडिंग) तथा शौर्य गेट का निर्माण श्री महेश पाठक (उद्योगपति) द्वारा करवाया गया है । वीरगति के समय परिवार से सत्ता द्वारा किए गए वादे, कोरे वादे ही रह गये हैं । इस परिवार की भी कहानी प्रदेश के अन्य वीरगति प्राप्त सैनिकों के परिवारों की तरह ही है । जब सैनिक वीरगति को प्राप्त होता है तो जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों द्वारा बड़े बड़े वादे किए जाते हैं, खूब घडियाली आंसू बहाए जाते हैं, लेकिन द्वार से हटते ही सब वादे भुला दिए जाते हैं और परिवार कार्यलयों में इस टेबल से उस टेबल पर चक्कर लगाता रहता है । इनका हक दिलवाने की बात कौन कहे, वही अधिकारी और जनप्रतिनिधि इनको पहचानते तक नहीं हैं ।

 

 

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