हरी राम यादव, सूबेदार मेजर (आनरेरी)
वीरगति दिवस पर विशेष
कैप्टन अंशुमान सिंह, कीर्ति चक्र (मरणोपरांत)
एक सैनिक के अन्दर “देश हित सर्वोपरि” की भावना हिलोरें मारती रहती है । उसे देश हित के सामने सब कुछ बौना नजर आता है । वह सम्पूर्ण राष्ट्र और समाज को अपना परिवार मानता है । वह कभी भी अपने राष्ट्र, समाज और साथियों को संकट में नहीं देख सकता, वह इनके लिए मौत से भी टक्कर लेने के लिए तैयार रहता है । आज एक ऐसे ही वीर का वीरगति दिवस है जिन्होंने अपनी अंतिम सांसों तक अपने फर्ज को पूरा करने का प्रयत्न किया और फर्ज का कर्ज पूरा करते हुए देश की रक्षा में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
18-19 जुलाई 2023 की रात में चंदन ड्रॉपिंग ज़ोन में सेना के फाइबर ग्लास हट में आग लग गई और यह आग तेजी से चल रही हवा के कारण जल्दी ही विकराल हो गयी । कैप्टेन अंशुमान सिंह ने आग लगने की आवाज सुनी और अपने फाइबर ग्लास हट से बाहर निकल पड़े उन्होंने देखा कि बगल के फाइबर ग्लास हट में आग फ़ैल चुकी है, पूरा हट धुएं से भर गया था । अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना वे उस फाइबर ग्लास हट में घुस गए और वहाँ से 4-5 जवानों को बाहर निकाला। इसी बीच उनकी निगाह उस फाइबर ग्लास हट की तरफ गयी जहाँ पर चिकित्सा उपकरण और जीवन रक्षक दवाएं रखी हुए थीं । धुएं और आग की तेज लपटों के बीच उस फाइबर ग्लास हट के अंदर जाकर जीवन रक्षक दवाइयों एवं उपकरणों को बचाना मुश्किल था लेकिन कैप्टन अंशुमान सिंह ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर अपने फाइबर ग्लास हट के अंदर घुस गए । तेज हवा के कारण बिकराल हुई आग की लपटों ने कैप्टन अंशुमान सिंह को अपनी गिरफ्त में ले लिया । अथक प्रयासों के बाद भी मां भारती का यह अमर सपूत उस फाइबर ग्लास हट से बाहर नहीं आ पाया और अपने कर्तव्यों को पूरा करते हुए मातृभूमि के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।
कैप्टन अंशुमान सिंह ने अपनी सुरक्षा की परवाह किए बिना अपनी यूनिट के जवानों और जीवन रक्षक उपकरणों तथा दवाओं को बचाने के लिए असाधारण बहादुरी और उच्चतम क्रम के संकल्प का प्रदर्शन किया। उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक अपने कर्तव्यों को पूरा करने का प्रयास किया। उनकी विशिष्ट वीरता और बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत शांति काल के दूसरे सबसे बड़े सम्मान “कीर्ति चक्र” से सम्मानित किया गया। 05 जुलाई 2024 को राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मुर्मू ने यह सम्मान उनकी माता श्रीमती मंजू देवी और उनकी पत्नी श्रीमती स्मृति सिंह को प्रदान किया ।
कैप्टन अंशुमान सिंह का जन्म 16 अक्टूबर 1996 को जनपद देवरिया के गाँव बरडीहा दलपत के एक सैनिक परिवार में श्रीमती मंजू देवी और श्री रवि प्रताप सिंह के यहाँ हुआ था । उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा हिमाचल प्रदेश के प्रतिष्ठित चैल मिलिट्री स्कूल और सशस्त्र बल चिकित्सा महाविद्यालय (AFMC) पुणे से पूरी की । एमबीबीएस की शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने आगरा में एक साल की इंटर्नशिप पूरी की । इसके पश्चात भारतीय सेना की मेडिकल कोर में 19 मार्च 2020 को कमीशन मिला। जुलाई 2023 में, कैप्टन अंशुमान सिंह सियाचिन ग्लेशियर में तैनात 26 मद्रास रेजिमेंट से अटैचमेंट पर 26 पंजाब बटालियन के 403 फील्ड अस्पताल में सेवारत थे।
कैप्टन अंशुमान सिंह का परिवार लखनऊ के पारा मोहान रोड पर रहता है। इनके परिवार में इनके माता, पिता के अलावा इनसे छोटा भाई घनश्याम सिंह और बहन तान्या सिंह हैं। कैप्टन अंशुमान सिंह की पत्नी इनके परिवार को छोड़कर अपने माता पिता के यहाँ जा चुकी हैं । कैप्टन अंशुमान सिंह की वीरता और बलिदान को याद रखने के लिए लखनऊ के उनके घर के पास की कालोनी का नाम “शहीद कैप्टेन अंशुमान सिंह नगर” रखा गया है। लखनऊ के बुद्धेश्वर चौराहे पर कैप्टन अंशुमान सिंह की प्रतिमा स्थापित की गयी है । भारतीय रेलवे ने अगस्त 2024 में लुधियाना से संचालित इंजन नंबर डब्ल्यू डी पी 4बी 40005 कैप्टेन अंशुमान सिंह का नाम अंकित किया है । इनके पैतृक गांव बरडीहा दलपत के ग्राम सचिवालय और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बरडीहा दलपत का नामकरण कैप्टन अंशुमान सिंह के नाम पर किया गया है । उत्तर प्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम द्वारा 01 जनवरी 2025 से कैप्टन अंशुमान सिंह की याद में “शहीद एक्सप्रेस बस सेवा “ की शुरुआत की गयी है ।
सैनिक अस्पताल, आगरा में एक परिसर का नामकरण तथा सैनिक अस्पताल काम्पटी के मोटीवेशनल हाल में इनकी एक प्रतिमा स्थापित की गयी है । आर्म्ड फोर्सेस मेडिकल कालेज, पुणे के कैडेट मेस का नाम बदलकर “कैप्टन अंशुमान सिंह, कीर्ति चक्र सेंट्रल कैडेट मेस” कर दिया गया है । अभी हाल ही में सेना चिकित्सा कोर प्रशिक्षण केंद्र ने एक संग्रहालय का नामकरण “कैप्टन अंशुमान सिंह कीर्ति चक्र संग्रहालय” किया है । लखनऊ कैंट के छप्पन चौराहे का नामकरण भी कैप्टन अंशुमान सिंह के नाम पर किया जाना प्रस्तावित है ।
कैप्टन अंशुमान सिंह के परिजनों का कहना है की केंद्र सरकार को सेना के निकटतम सम्बन्धी (नेक्स्ट टू किन) नियमों में बदलाव करना चाहिए। इस नियम के कारण वीरगति प्राप्त करने वाले या किसी दुर्घटना में आकस्मिक निधन होने पर सेना से मिलने वाली मदद सैनिक की पत्नी को मिलता है, चाहे उसकी शादी को दो ही दिन क्यों न हुआ हो । जब कोई युवा सेना में भर्ती होता है तो उसे माता-पिता का नाम निकटतम सम्बन्धी के रूप में दर्ज किया जाता है। शादी के बाद माता-पिता की जगह पत्नी का नाम दर्ज हो जाता है । सैनिक के वीरगति प्राप्त होने के बाद आर्थिक मदद से लेकर तमाम सैन्य सुविधाएं उसकी पत्नी को मिलती है। इस नियम के कारण देश के तमाम सैनिकों के माता पिता वृद्धावस्था में अदालतों का चक्कर लगा रहे हैं और पत्नियाँ पेंशन , कैंटीन, मेडिकल आदि की पूरी सुविधा ले रही हैं ।
यदि मानवीय दृष्टिकोण से भी सोचा जाए तो एक बच्चे को पाल पोसकर बड़ा करने और सेना में भर्ती होने लायक बनाने में लगभग 18 से 20 साल लग जाते हैं । एक लड़की व्याह कर आती है और सैनिक की मृत्यु होने पर सेना से मिलने वाले पूरे परिलाभों की हक़दार हो जाती है । यह देखा गया है कि सैनिक की चिता की आग को भी ठंढी होने का भी इंतजार किए बिना बहुएं अपना पता बदलवाकर अपने मायके चल देती हैं और कुछ समय बाद पुनः विवाह कर सामान्य जीवन बिताने लगती है । सैनिक के माता पिता दर दर की ठोकरें खाते फिरते है, यह हालात तब और बदतर होते हैं जब सैनिक अपने माता पिता का अकेला पुत्र हो । इस नियम के कारण उत्तर प्रदेश में भी कई वीरता पदक विजेताओं और दिवंगत सैनिकों के परिवार परेशान हैं ।
भारतीय सेना और सरकार को निकटतम सम्बन्धी (नेक्स्ट टू किन) के अपने इन पुराने नियमों में बदलाव करना चाहिए , यह मानवीय दृष्टिकोण से और धरतलिए सच्चाई के अनुसार समय की मांग है । अगर सैनिक की पत्नी पति के निधन के बाद सैनिक के माता पिता का घर छोडती है तो सैनिक की पेंशन का कम से काम आधा भाग उनके माता पिता को जीवन यापन के लिए मिलना चाहिए ।







