विकास के लिए नाम ही काफी है? महिला एवं बाल विकास ?

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प्रभारी सम्पादकः  राजेन्द्र सिंह जादौन, (म. प्र)।

 

 

 

विकास के लिए नाम ही काफी है? महिला एवं बाल विकास ?

 

महिला एवं बाल विकास। नाम पढ़ते ही ऐसा लगता है मानो विकास की गंगा बह रही हो। हर महिला के चेहरे पर मुस्कान, हर बच्चे के हाथ में किताब, और हर आँगन में कुपोषण का नामोनिशान तक न हो। नाम में ही इतनी मिठास है कि अगर यही सच हो जाए तो भारत तो क्या, पूरा ब्रह्मांड भी नतमस्तक हो जाए। लेकिन साहब, ज़रा आँख खोलकर हकीकत देखिए। नाम और काम में वही फ़र्क है जो नेता के वादों और जनता के सपनों में होता है।

 

इस विभाग का नाम सुनते ही लोगों को लगता है कि यह सबसे पवित्र जगह है। जहाँ से हर महिला को न्याय, हर बच्चे को शिक्षा और पोषण का आशीर्वाद मिलता है। योजनाओं का अंबार है पोषण आहार, आँगनवाड़ी, लाडली लक्ष्मी, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ, और न जाने कितनी योजनाएँ। बजट भी ऐसा कि सुनकर किसी गरीब का दिल बैठ जाए। हज़ारों करोड़ इस नाम के पीछे बहाए जाते हैं। लेकिन सवाल यह है कि ये हज़ारों करोड़ आखिर बहते कहाँ हैं गंगा-यमुना में तो नहीं जाते। हाँ, किसी और दरिया में जरूर डूब जाते हैं।

 

नाम में जादू है, काम में धुंध है।

महिला एवं बाल विकास विभाग की ताक़त यह है कि इसे देखने के लिए आपको आँखों पर चश्मा नहीं, बल्कि दूरबीन लगानी पड़ेगी। विधानसभा में हाल ही में पेश हुए आँकड़े बताते हैं कि प्रदेश में कितनी महिलाएँ और बच्चे लापता हैं। और ज़िम्मेदारी किसकी है? जी हाँ, इसी विभाग की। जो अपने नाम के मुताबिक़ “विकास” कर रहा है, लेकिन किस दिशा में ये बताना मुश्किल है।

 

लापता बच्चों और महिलाओं की लिस्ट बढ़ रही है। पोषण की योजना है, लेकिन कुपोषण की हकीकत भी है। स्कूलों में मिड-डे मील है, लेकिन पोषण का स्तर देखकर लगता है जैसे ये खाना नहीं, वजन घटाने का कोई विदेशी डाइट प्लान हो। गाँव-गाँव में आँगनवाड़ी है, लेकिन वहाँ बच्चे क्या खा रहे हैं, ये पूछने की हिम्मत किसी में नहीं। क्योंकि अगर आपने पूछा तो जवाब में या तो फ़ाइल दिखाई जाएगी या नियम-क़ानून का ऐसा जाल बिछाया जाएगा कि आप खुद लापता हो जाएँगे।

हर योजना का उद्देश्य सुनकर लगता है कि अब तो भारत में कोई भूखा नहीं रहेगा। लेकिन जब हक़ीक़त में जाते हैं तो लगता है कि योजना का पैसा तो विकास कर गया, पर जनता वहीं की वहीं। पोषण आहार की गाड़ियों में क्या आता है, ये गाड़ीवाले और बाबू ही जानते हैं। किसी-किसी जगह तो गाड़ी आती ही नहीं। बच्चे भूखे, महिलाएँ परेशान और योजना के काग़ज़ चमकदार।

 

प्रदेश में कुपोषण के आँकड़े किसी से छुपे नहीं। अखबार खोलो तो हर साल नया अभियान, नया नारा। लेकिन तस्वीर वही पुरानी। लगता है कुपोषण और सरकार में गहरा रिश्ता है जैसे जीजा-साली का। हर साल दोनों मिलते हैं, फोटो खिंचवाते हैं और फिर अलग-अलग हो जाते हैं। जब अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट आती है और भारत का नाम नीचे होता है, तब विभाग के अफसरों के माथे पर चिंता की लकीरें नहीं, प्रेस कॉन्फ्रेंस का मेकअप दिखता है।

 

महिला और बाल विकास के नाम पर जो योजनाएँ बनीं, उनका फायदा किसे मिला? महिलाओं को? बच्चों को? या सिर्फ़ उन लोगों को जो कागज़ों में विकास की इबारत लिखते हैं? यह विभाग योजनाओं का ऐसा थोक बाज़ार है, जहाँ हर योजना पर “विकास” का लेबल चिपका होता है। लेकिन हकीकत में ये योजनाएँ ज़्यादातर नेताओं के भाषणों में, अफसरों की फाइलों में और पोस्टरों में चमकती हैं।

 

कुपोषण की जाँच के नाम पर मीटिंग होती है। मीटिंग में चाय, बिस्किट और समोसे खाए जाते हैं। रिपोर्ट बनती है और उसमें लिखा जाता है कि सब ठीक है। अगली बार फिर मीटिंग होगी, फिर समोसे खाए जाएँगे, और फिर लिखा जाएगा“स्थिति नियंत्रण में है।” और जनता पूछती है“कहाँ है नियंत्रण? पेट में या फाइल में?”

 

 लापता बच्चों का सवाल

 

जब विधानसभा में यह आंकड़ा आया कि कितने बच्चे और महिलाएँ लापता हैं, तो सभी हैरान रह गए। लापता होना अब कोई खबर नहीं रह गई, यह तो जैसे रोज़ की बात हो गई है। सवाल यह है कि इन बच्चों की ट्रैकिंग कौन करेगा? जी हाँ, वही विभाग। लेकिन ट्रैकिंग का हाल ये है कि गूगल मैप भी शरमा जाए।

 

 असली विकास कहाँ हुआ?

 

विकास हुआ है, लेकिन जनता के लिए नहीं। विकास हुआ है विभाग की बिल्डिंगों में, अधिकारियों की कारों में, नए टेंडरों में। हर साल नए विज्ञापन, नए पोस्टर, नए नारे। “पोषण हमारा अधिकार है।” हाँ, नारा तो जोरदार है, लेकिन अधिकार की थाली खाली है।

 

महिला एवं बाल विकास का नाम पढ़कर लगता है कि ये विभाग महिलाओं और बच्चों के लिए वरदान है। लेकिन हकीकत यह है कि नाम में विकास है, पर काम में बस सवाल हैं। बजट आता है, योजनाएँ बनती हैं, पोस्टर लगते हैं, भाषण होते हैं। और फिर? फिर वही पुराना किस्सामहिलाएँ लापता, बच्चे कुपोषित, और विभाग व्यस्त…अगले पोस्टर डिजाइन करने में।

 

विकास सिर्फ़ नाम में है। असली विकास तभी होगा जब योजनाएँ काग़ज़ से निकलकर ज़मीन पर आएँगी। जब पोषण आहार सिर्फ़ फाइलों का नहीं, बच्चों का हिस्सा बनेगा। जब हर महिला को सुरक्षा और सम्मान मिलेगा। वरना ये विभाग बस नाम का रहेगा“महिला एवं बाल विकास”जहाँ नाम बड़ा, दर्शन छोटे और काम? पूछिए मत।

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