दोहों के संसार में 

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सुधा गोयल

 कृष्णानगर,डा दत्ता लेन, बुलंदशहर।

 

 

 

                  समीक्षा

 

दोहों के संसार में 

 

सुप्रसिद्ध दोहाकार,गजलकार, गीतकार,बुलंद प्रभा के सम्पादक आदरणीय रमेश प्रसून जी की सद्ध प्रकाशित पुस्तक “दोहों के संसार में ” मेरे सामने है जो श्वेत वर्ण प्रकाशन से प्रकाशित है।

दोहों के संसार में आ.रमेश प्रसून जी से रुबरु होती हूं। द्वैत -अद्वैत की बात करते हुए अपना मन खोल देते हैं। कोई समझे न समझे पर ये स्पष्ट है कि भावना को समझने के लिए मन चाहिए।यदि पाठक के पास वह मन है तो शीघ्र ही कवि के साथ एकाकार हो जाता है।यह कृति अपनी प्रिय पत्नी पुष्पाजी को समर्पित एक पुष्पांजली ही है।जीवन का एक बड़ा भाग पत्नी के साथ गुजारने के बाद अकेला व्यक्ति अक्सर द्वैत -अद्वैत की ही बात करता है प्रतीक चाहे राधा हो या श्याम बात एक ही हैं।कुछ दोहे मेरे मन को हवा के झोंके से स्पर्श कर गए।उनके लिए जितना लिखूं कम है।आप सबका ध्यान अपने साथ उधर ही लेकर चल रही हूं।बानगी देंखें-

   मन में मनमोहन बसे,सुधियों में प्रिय श्याम 

         राधा की हर श्वांस नित जपती जिनका नाम 

 

और देखें -छूकर मेरे मन को कुछ कहते हैं ये शब्द –

       “

 चिर युग से चिरकाल से,यति गति मति रति भूल

        झूल रही चिर राधिका, नित्य श्याम संग झूल”

 कवि अपनी विरह वेदना व्यक्त करता है –

          “गुलमोहर की शाख पर,ऋतु गाएं जब गीत 

           झर झर कहते फूल कुछ,आ जाओ मन मीत”

तड़पन है कवि के मन में।वह अपनी विकल विरह व्यथा को शब्द दे रहा है और पाठक को भी अपनी विकल वेदना में अपने साथ लेकर चल रहा है।आह-

“करती जब काली घटा पुरवा से संवाद 

        उमड़ घुमड़ आती प्रिये, तभी तुम्हारी याद।”

यहां आकर सारा ज्ञान द्वैताद्वैत भाव तिरोहित हो जाता है।

प्रकृति का रुप भी प्रिया का स्मरण करा रहा है।यह भावुक मन के कवि की वेदना को वहीं समझ सकता है जो इन गलियारों से गुजरा हो।मैं भी गुजर रही हूं कवि के साथ उन विरह विकल वेदना के साथ जहां अक्सर कवि प्रिया की बिंदिया,टूटी चूड़ियां और बिस्तर की सलवटें गिनता है। प्रकृति के हर रुप में प्रिया का नाम दीखता है जिसके साथ जीवन का एक बड़ा भाग कर्मपथ पर चलते गुजार दिया,वे पग चिन्ह क्या मिटाएं जा सकते हैं

 

प्रेम बहारों ने किया लगी मिलन की आस

         फूलों से ठंडक मिलती, जैसे झरा पराग”

लाजवाब,वाह भी आह भी।क्या कहूं कवि की लेखनी को ढ़ूंढ़ती हूं शब्द पर मिलते नहीं हैं,साथ चलकर वे भी विरह में डूब जाते हैं।कवि और भी कुछ कहना चाहता है

 चंदा ने दी चांदनी, सूरज ने दी धूप

        झूम उठी चंचल हवा, छू छू इसका रुप 

मैं कवि के साथ पृष्ठ दर पृष्ठ पढ़तीं बढ़ रही हूं।क्या छोड़ूं क्या लिखूं।कवि का विदीर्ण मन अपने उपमानों के साथ अपनी स्मृति, अपना जुड़ाव, बीते पलों में डूबता नजर आता है। पाठक को भी अपने साथ बहा ले जाता है।यही कविता की सार्थकता भी है।

मेरी कलम की यात्रा भी कवि के साथ आगे बढ़ रही है

जग को जो आलोकित करें तेरे नैन अधीर

        छूकर तेरी सांस को चलता नित्य समीर

अलौकिक अद्भुत कल्पना, जहां कुछ भी विचारणीय नहीं, जहां केवल खो जाना और पा लेना होता है।

ओढ़ दिशा की ओढ़नी

           आंचल रखा पसार

           चितवन तेरी मोहिनी 

            मन पर करें प्रहार

कवि यानि आदरणीय रमेश प्रसून जी राजनीति, खेती किसानी,जाति धर्म, सभी पर अपनी कलम चलाते हैं। उनसे कुछ भी नहीं छूटा है।अपनी वेदना में डूबे स्वंय ही स्वंय को संभालते हैं।व्यष्टि से समष्टि में समा जाते हैं।यही लेखन की वास्तविक परिणीती है।

        आ. प्रसूनजी को मैंने अपनी अल्प बुद्धि से जितना जाना समझा-शब्द देने का प्रयास किया। फिर भी काफी कुछ झूठ गया है।चंद श्ब्दों में इतना कुछ समेटना कहां सम्भव है।सूरज को दीपक क्या दिखाऊं?मैं तो स्वंय ही दोहों के संसार में डूब गयी।

कामना करती हूं कि दोहों के संसार में दोहाकार, गजलकार, गीतकार आदरणीय रमेश प्रसून जी को नये आयाम मिलें। बुलंदियां उनके कदम चूमती रहें।वे नया रचते रहे…. इन्हीं शुभकामनाओं के साथ

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