प्रभारी सम्पादकः राजेन्द्र सिंह जादौन (म. प्र)
जब नेता ही गाली देंगे तो समाज संस्कार कहाँ से सीखेगा?
भारतीय राजनीति का चेहरा हमेशा से बहस और विचारों की टकराहट पर खड़ा रहा है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में भाषा का स्तर जिस तेज़ी से गिरा है, वह लोकतंत्र की आत्मा पर सबसे बड़ा हमला है। संसद और विधानसभाओं से लेकर चुनावी रैलियों तक, और अब तो टीवी चैनलों की बहसों और सोशल मीडिया पर भी, नेताओं का शब्दकोश इतना गंदा और अभद्र होता जा रहा है कि सुनने वालों को शर्म आ जाए।
राजनीति में असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन असहमति को अपमान और गाली में बदल देना इस बात का संकेत है कि राजनीतिक वर्ग मुद्दों पर बहस करने की बजाय व्यक्तिगत आक्षेप और चरित्रहनन पर उतर आया है।
अभद्र बयानों की अंतहीन सूची
आपने जो सूची दी, वह कोई अपवाद नहीं बल्कि प्रवृत्ति है।
सुब्रमण्यन स्वामी ने सोनिया गांधी को ‘वेश्या’ और प्रियंका गांधी को ‘शराबी’ कहकर राजनीति की भाषा को दलदल में धकेल दिया।
नरेंद्र मोदी जैसे प्रधानमंत्री पद पर बैठे व्यक्ति ने विरोधियों के लिए ‘जर्सी गाय’, ‘हाइब्रिड बछड़ा’, ‘50 करोड़ की गर्लफ्रेंड’ और ‘डीएनए में प्रॉब्लम’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।
दयाशंकर सिंह ने मायावती जैसी महिला नेता की तुलना वेश्या से कर दी।
निरंजन ज्योति ने तो पूरी जनता को ‘रामजादों और हरामजादों’ में बाँट दिया।
अश्विनी चौबे ने सोनिया को ‘जहर की पुड़िया’, ‘पूतना’ और लालू–नीतीश को ‘रंगा-बिल्ला’ तक कह डाला।
श्यामपद मोंडल ने ममता बनर्जी को ‘किन्नर’ कहा।
सूची यहीं खत्म नहीं होती। नेताओं की जुबान पर आए रोज ऐसे बयान चढ़ते रहते हैं, जिन्हें लिखते-सुनते भी संकोच होता है।
सत्ता और दोहरा चरित्र
विडंबना यह है कि यही नेता जब विपक्षी खेमे से कोई छोटा नेता गाली देता है, तो ‘संस्कार’ और ‘भारतीय संस्कृति’ की दुहाई देने लगते हैं। खुद महिलाओं के लिए घटिया उपमा देंगे, लेकिन विरोधी खेमे की जरा-सी अशोभनीय टिप्पणी पर संसद ठप करा देंगे। यही राजनीतिक दोहरापन जनता देख रही है।
डेढ़ इश्किया के अरशद वारसी का डायलॉग इस पर सटीक बैठता है अबे गाली भी खुद देंगे और संस्कार का भाषण भी खुद झाड़ेंगे?
लोकतंत्र का गिरता स्तर
भाषा की यह गंदगी सिर्फ नेताओं तक सीमित नहीं रहती। जब जनता के सामने बड़े नेता मंच से ‘हरामजादे’ या ‘किन्नर’ जैसे शब्द कहते हैं, तो भीड़ तालियाँ बजाती है। धीरे-धीरे यह गाली संस्कृति पूरे समाज में वैध ठहराई जाती है। टीवी बहसों में भी यही झलकता है राजनीतिक प्रवक्ता एक-दूसरे की माँ-बहन करने पर आमादा रहते हैं।
लोकतंत्र में जनता नेताओं से सिर्फ नीतियों की अपेक्षा नहीं करती, बल्कि संस्कार और शालीनता की भी उम्मीद रखती है। लेकिन आज राजनीति ने हमें यह सिखाया है कि गाली देना ही ताकत है और तंज कसना ही रणनीति।
महिला नेताओं पर सबसे ज्यादा वार
ध्यान देने की बात है कि सबसे ज्यादा अपमानजनक भाषा महिलाओं के लिए प्रयोग की जाती है। सोनिया गांधी को ‘जर्सी गाय’, प्रियंका गांधी को ‘शराबी’, मायावती को ‘वेश्या से बदतर’, ममता बनर्जी को ‘किन्नर’ कहना सिर्फ राजनीतिक हमला नहीं बल्कि महिला विरोधी मानसिकता का प्रमाण है। यह लोकतंत्र के लिए शर्मनाक है कि महिला नेताओं को आज भी उनके काम से नहीं, बल्कि उनके लिंग और रूप-रंग से आँका जाता है।
क्या सचमुच यही है भारतीय संस्कृति?
जो नेता ‘भारतीय संस्कृति और परंपरा’ का ढोल पीटते हैं, वही मंच से गाली बकते हैं। भारतीय संस्कृति तो ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ और ‘मातृदेवो भव’ का संदेश देती है। अगर संस्कृति के नाम पर राजनीति करनी है तो पहले भाषा को शुद्ध करना होगा।
नेताओं के लिए सबसे आसान बहाना यह है कि जनता को यही पसंद आता है। सच भी है जब मंच से कोई नेता अपशब्द कहता है, तो भीड़ तालियों से उसका स्वागत करती है। यही तालियाँ उन्हें और ज़्यादा अभद्र होने की प्रेरणा देती हैं। इसीलिए ज़िम्मेदारी सिर्फ नेताओं की नहीं, बल्कि जनता की भी है। अगर भीड़ अपशब्दों पर तालियाँ बजाना बंद कर दे, तो कोई भी नेता गाली की राजनीति नहीं करेगा।
मीडिया भी इस गाली संस्कृति का बड़ा पोषक है। चैनल बहस में नेताओं को उकसाते हैं, और फिर वही ‘गाली कट’ अगले दिन हेडलाइन बनती है। मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और सिर्फ टीआरपी की होड़ चलती है।
1. आचार संहिता – चुनाव आयोग को सिर्फ खर्च और प्रचार पर ही नहीं, बल्कि भाषा पर भी सख़्त निगरानी रखनी चाहिए।
2. कानूनी दंड – अपमानजनक और स्त्रीविरोधी टिप्पणियों पर फौरन आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए।
3. जनता का दबाव- जनता अगर गाली देने वाले नेताओं को वोट देना बंद कर दे, तो यह संस्कृति एक दिन में खत्म हो सकती है।
4. मीडिया की जिम्मेदारी -मीडिया को गाली को ग्लैमराइज करना बंद करना होगा।
आज भारतीय राजनीति एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ मुद्दे गायब हैं और गाली ही एजेंडा बन चुकी है। यह लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए सबसे खतरनाक संकेत है। गाली से चुनाव जीतने वाले नेता समाज में वही संस्कृति फैलाते हैं। अगर हमें आने वाली पीढ़ियों को एक स्वस्थ लोकतंत्र देना है, तो राजनीति से गाली की यह परंपरा खत्म करनी होगी। वरना वह दिन दूर नहीं जब संसद और विधानसभाएँ भी चौराहे की गालीबाज़ी से अलग न दिखें क्योंकि याद रखिए जब नेता ही गाली देंगे, तो समाज संस्कार कहाँ से सीखेगा?







