राजनीति में गिद्ध व चील का अवतरण 

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सुधाकर आशावादी

 

 

                      व्यंग्य

 

राजनीति में गिद्ध व चील का अवतरण 

 

                        (नया अध्याय, देहरादून)

 

देश, काल और परिस्थिति कब क्या करा दे, इस संदर्भ में कोई सटीक पूर्वानुमान नही लगा सकता। शहर हो या गाँव, गिद्ध और चील के दर्शन दुर्लभ हैं। कभी कभी किसी मृत पशु में अपना भोजन तलाशते हुए दिखाई देते हैं, वह भी प्रत्यक्ष में नही, किसी यू ट्यूब या डिस्कवरी चैनल पर। स्थिति ही कुछ ऐसी है। गिद्ध और चील स्वयं अस्तित्व संकट से जूझ रहे हैं। उनके अस्तित्व पर संकट छाने के अनेक कारण हो सकते हैं। मसलन मांस भक्षण में गिद्धों व चीलों की प्रतिस्पर्धा पूर्व की अपेक्षा अधिक बढ़ गई है। मांसाहारी प्राणियों की संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। गिद्ध व चीलों का मुक़ाबला केवल जंगली जानवरों से नही है। सियासत में भी कुछ ऐसे गिद्ध उत्पन्न हो चुके हैं, जो गिद्ध और चीलों को कड़ी टक्कर देने लगे हैं।

जैसे भोजन की तलाश में पैनी नजर से मांस की खोज करने वाले गिद्ध और चील जीवों की मृत्यु की प्रतीक्षा में आसमान में मंडराते रहते थे। वैसे ही सियासत की चील हर मुद्दे में अपनी सियासत का भोजन तलाशने की फिराक में रहती है। कोई आत्महत्या करे या आकस्मिक हृदयघात से उसके प्राण नश्वर देह का त्याग कर दें , कोई गृह क्लेश के कारण मृत्यु का वरण करे या क़र्ज़ के बोझ से आहत होकर फाँसी लगा ले, सियासत की चील और गिद्ध हर मौत पर अपने अपने विमर्श उजागर करने लगते हैं। वे अपने विमर्श के अनुसार सियासत करने का कोई अवसर गँवाना नही चाहते। उन्हें मौत के लिए परम पिता परमात्मा का विधान उत्तरदायी नही लगता। उन्हें मौत के लिए अपने मन मुताबिक़ किसी न किसी व्यक्ति या संस्था को मौत का ज़िम्मेदार ठहराना ही है।

यदि ऐसा न होता, तो किसी विशेष अभियान में जुटे प्राणियों की मृत्यु पर सभी सियासी गिद्धों व चीलों का एक सा ही विमर्श विस्तार न पाता। प्राकृतिक रूप से असली गिद्ध व चीलें मृत पशु देहों की खाल और मांस नोचने तक ही सीमित रहते हैं। सियासी गिद्ध और चील किसी की आकस्मिक मौत का सियासी लाभ उठाने के लिए वास्तविकता को नकार कर समाज और राष्ट्र के सुख चैन, शांति को नोचने का कुचक्र रचते हैं। उन्हें आतंकी हमलों में मृत लोग के असली हत्यारों की हरकतें भी अनुचित नहीं लगती। उन्हें अराजक आंदोलनों में मरने वाले भी शहीद दिखाई देते हैं। उनकी अपनी मर्जी, उनका अपना चश्मा, उनका अपना नजरिया, वे जिसे चाहें, उसे ही किसी भी मौत का ज़िम्मेदार ठहरा सकते हैं। बहरहाल अभिव्यक्ति की आज़ादी सभी को है और अपने अपने विमर्श स्थापित करने का अधिकार भी सभी को है। असली गिद्ध और चील कभी कोई विमर्श नहीं बनाते, वे जो है जैसा है जैसी स्थिति के अनुरूप ही आचरण करते हैं। सियासत के गिद्ध और चील कभी प्राकृतिक जीव नही हो सकते। वे अपने ख़ुराफ़ाती दिमाग़ से विमर्श बुनते हैं और उसी के अनुसार आचरण करते हैं। बूढ़ा मरे या जवान, इससे उन्हें कोई सरोकार नहीं होता। वे अपनी सियासत के अनुसार मौतों में भी अपना सियासी भोजन तलाशने में कोई कसर बाक़ी नहीं छोड़ते।  (विनायक फीचर्स)

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