अपने आप पर भरोसा रखिए और मानसिक संतुलन बनाकर रखिए। 

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लेखिका/कवयित्री

सुश्री सरोज कंसारी

नवापारा राजिम, छत्तीसगढ़।

 

 

                    (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

अपने आप पर भरोसा रखिए और मानसिक संतुलन बनाकर रखिए। 

 

हर मनुष्य के पास हर पल एक नए विचार, माहौल और बाते होती हैं। कुछ सुखद तो कुछ दुखद होती हैं, लोगों को सुनकर, देखकर, सहनकर कभी-कभी मनुष्य होने पर अफसोस होता हैं।छोटी सी जिंदगी में इतनी परेशानी, उदासी और गमगीन एहसास होते हैं। इन सबके बीच खुद को संभालना, सहम जाना और मन ही मन द्वंद को पालकर रखना बहुत तकलीफ से भरा होता हैं। सुख की बौछार कम ही होती हैं, लेकिन किसी के दुर्व्यवहार, उपेक्षा और यातना से हृदय भींग जाती हैं।

आज के समय में नफरत, द्वेष, घृणा और जलन की अधिकता हैं। दिल से किसी को अपने प्रेम पूर्ण स्वभाव, मीठी वाणी से आज किसी के मन को स्पर्श कर पाने में असमर्थ हैं।क्योंकि आज अंतस के भाव आपके शालीनता, सादगी, सरलता, सहृदयता, ईमानदारी और मित्रवत, व्यवहार को उतना महत्व नही देते, जितना दौलत- शौहरत, पद- प्रतिष्ठा बाह्य दिखावा के पीछे भागते हैं। दिल से दिल का मिलन नहीं होता, रिश्तों में आज मजबूती नहीं।

हम कह तो देते हैं बहुत ही गर्व से मेरे है, ये खून का रिश्ता हैं, सगे-संबंधी, स्नेहीजन हैं और जीवन भर भागते हैं उनके पीछे। लेकिन आज अपनो की नजर में ही सम्मान नहीं दिखता पास रहकर भी कुछ लोग अजनबी से लगते हैं। कोई कितने भी दिखाने का प्रयास करें की आपके शुभ चिंतक हैं। पर जिनके अंदर आपके लिए कोई अपनत्व के भाव नहीं, उनके किसी न किसी हरकत से उनकी दूषित मानसिकता प्रदर्शित हो ही जाती हैं। की वे सिर्फ औपचारिकता निभा रहें हैं।

जो भावनाओं से भरे होते हैं, उन्हें अपने सानिध्य में रहने वाले हर व्यक्ति की नियत सोच का आभास हो ही जाता हैं। जो दिल की गहराई से निभाते हैं, किसी भी रिश्ते को वे साधारण नहीं होते। वे महसूस कर लेते हैं कौन अपने हैं और कौन नहीं कैसे हैं? जो सच में सही व्यक्तित्व, मर्यादित संयमित और संस्कारी होते हैं। जिनके मन में आपके लिए प्रेम और सम्मान का भाव होता हैं उनके बिना जताए भी उनके होने से ही सुकून मिलता हैं। उनकी सच्चाई, और मासूमियत चेहरे पर झलक जाती हैं।

मन की सुंदरता जरूरी हैं, चाहे तन को बाहर से कितना भी सजा लें। बाह्य रूप की अपेक्षा आंतरिक शुद्धता, सात्विक जीवन बेहद जरूरी हैं। अक्सर भीड़ में और अपनो के बीच भी कभी- कभी खुद को तन्हा पाते हैं। कारण होता है हम जो ढूंढते हैं, जैसे चाहते है, वैसे ही विचार धारा के लोग समझने वाले नहीं मिलते, तो हमें वहां घुटन होती हैं। आज रिश्तों के प्रति समर्पण, त्याग- तपस्या विश्वास नहीं। आज के रिश्ते एकदम नाजुक होते हैं, जो कभी भी कहीं भी डगमगा जाते हैं। विपरित समय आने पर वक्त पड़ने पर अपने ही या करीबी जन मुख मोड़ लेते हैं, पराएं सा व्यवहार देते हैं। यहां जख्म को सहलाने वाले कम ही हैं, और उसे कुरेदने वाले बहुत हैं। इसलिए भ्रम में जिंदगी मत गुजारिए बंधे रहिए, निभाइए, लेकिन किसी बात को, दिल से मत लीजिए।

खुद की सुख-शांति के लिए आध्यात्म, सत्संग और ईश्वर के साथ जुड़कर रहिए। अपने आप पर भरोसा रखिए और मानसिक संतुलन बना कर रखिए। जग में आए हैं तो कुछ अच्छा करिए, परोपकारी बनिए। लेकिन बदले में कुछ मत मांगिए, अपने स्वभाव में मस्त रहिए। ऐसे बनिए की कोई बहला न सकें, बहका न सकें, और किसी षडयंत्र में फंसा न सके। नहीं तो भावनाएं हर पल व्यथित होती रहेगी। खुद को खास बनाइए, पहले अपने आप से प्रेम करना, खुद को हिम्मत देना सीखिए। अब गया वो जमाना जब किसी के प्रेम में, इंतजार में, किसी अपने के लिए लोग मर मिटते थे, आज परिस्थिति अलग हैं। आज अपनो के बीच उनके साथ रहते हुए भी, एक साथ खुश रहकर जी नही पाते, एकता नहीं सामंजस्य नहीं,एक दूसरे को शक की निगाह से देखते हैं, स्वार्थ से भरे हुए है, अपनी को ही धोखा देने में कोई संकोच नहीं करते। और हम समझते हैं काम आयेंगे, सहारे देंगे, हमारी परवाह करते हैं। एक भ्रम में ही तो हम जीवन गुजार देते हैं।

निकलिए अपनी सीमित दायरे से और हुनरमंद बनिए।एक काबिल इंसान बनिए हर पल खुद को, हर दृष्टि से योग्य बनाने के लिए प्रयास कीजिए। दूसरों के पीछे रहकर अपना कीमती समय बर्बाद मत किजिए। खुद को निखारने में पूरी क्षमता लगा दिजिए नहीं तो- गिड़गिड़ाते, चापलूसी करते, दुख भरी कहानी सुनाते, हीनभाव से ग्रसित ही रहेगें। याद रखिए !हर जगह अपनी बेबसी, लाचारी मत बताइए, लोग कमजोर को गले नही लगाते, उन्हें दुत्कार देते हैं। उपेक्षित करते हैं, कठोर वचन कहते हैं। गलत का परिणाम कभी भी सही नहीं हुआ हैं, इसलिए दुनिया को देखकर अपने अच्छे स्वभाव को मत बदलिए। बस जैसे है वैसे ही रहिए और निखारते रहिए खुद के व्यक्तित्व को। बस अपनी जगह सही बने रहिए।

इंसान की प्रवृति बदलती रहती हैं, कब कौन किस रुप में मिलेंगे क्या कहेंगे या करेगें यह अंदाजा लगाना संभव नहीं? आज जीवन में नाम, तारीफ, सुख- समृद्धि,भोग-विलास पूर्ण जीवन में अधिकतर व्यस्त और मस्त हैं। बहुत कम लोग ही मिलेंगे जिनके सानिध्य में जाने से जीने की चाह जागृत हो, जिनके संपर्क से संवाद से समय से सुकुन मिले। क्योंकि आज लोगों को हर पल अपने आस्तित्व की जीवित रखने के लिए बहुत संघर्ष करना पड़ता हैं। पल भर की लापरवाही और लोग बहाने ढूंढते है- किसी को नुकसान पहुंचाने, उनकी चरित्र पर ऊंगली उठाने और नीचे दिखाने के लिए हैं।

सभी मनुष्य हैं, दर्द होता हैं। होनी- अनहोनी, दुर्घटना या हादसे होने पर। एक मनुष्य दूसरे को नहीं समझ पाते, यही सबसे बड़ी दुख की बात हैं। आज सबसे ज्यादा हमें आपस में सहयोग, करुणा, दया सहानुभूति और क्षमा के भाव की जरूरत हैं। लेकिन आज एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाने लगे रहते हैं। सांसारिक जीवन का निर्वहन करते हुए जितना हो सकें सभी का मानसिक मनोबल बढ़ाइए। रिश्ते सिर्फ नाम के न हो किसी से भी जुड़े आत्मीयता होनी चाहिए।

अपने या पराएं पन का भाव मत रखिए ।हम सभी एक ही मंजिल के मुसाफिर हैं। बारी-बारी से जाना हैं, कोई आज तो कोई कल लेकिन सदा के लिए रहना किसी को नहीं हैं। इसलिए किसी से बैर- दुश्मनी लेकर मत चलिए।प्यार हर इंसान की जरूरत हैं जिससे आत्मा शुद्ध होती हैं। नफरत मत कीजिए चाहें जीवन का कोई भी मुकाम हो, सहज- सरल रहिए। अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दिजिए, और हर किसी को मिठास दिजिए। अपने कटु व्यवहार से कड़वाहट का अनुभव किसी को मत कराइए।____________________________________

 

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