दिग्विजय सिंह का बंगलादेश की हिंसा को ‘रिएक्शन’ कहकर समझाना अस्वीकार्य।

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पवन वर्मा

 

 

 

दिग्विजय सिंह का बंगलादेश की हिंसा को ‘रिएक्शन’ कहकर समझाना अस्वीकार्य।

 

                       (नया अध्याय, देहरादून)

 

बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों पर हो रहे हमले केवल एक पड़ोसी देश की आंतरिक समस्या नहीं हैं, बल्कि यह एक गंभीर मानवीय संकट और सभ्य समाज के लिए गंभीर चुनौती हैं। ऐसे मामलों में शब्दों का चयन उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि रुख। इसी संदर्भ में कांग्रेस के नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का यह बयान कि “बांग्लादेश में हिंदुओं पर हो रहे हमले भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही कार्रवाइयों का रिएक्शन हैं” न केवल राजनीतिक विवाद का विषय बना है, बल्कि नैतिक और वैचारिक स्तर पर भी स्वीकार करने योग्य नहीं है।

यह बयान इसलिए अस्वीकार्य नहीं है कि इस पर आपत्ति जताई जा रही है, बल्कि इसलिए भी अस्वीकार्य है कि यह अपने आप में हिंसा को देखने का एक खतरनाक तरीका प्रस्तुत करता है। हिंसा को ‘प्रतिक्रिया’ के रूप में परिभाषित करना, उसे अपराध की श्रेणी से हटाकर कारणों की बहस में धकेल देना कभी भी सही नहीं माना जा सकता।

हिंसा कभी प्रतिक्रिया नहीं होती। वह हमेशा अपराध होती है। जब किसी समुदाय के घर जलते हैं, मंदिरों को निशाना बनाया जाता है, मासूम लोगों को उनकी पहचान के आधार पर डराया जाता है या मारा जाता है, तब उस हिंसा का कोई सामाजिक, राजनीतिक या ऐतिहासिक औचित्य नहीं हो सकता। ऐसे में ‘रिएक्शन’ शब्द का इस्तेमाल करना पीड़ितों के दर्द को कमतर आंकने जैसा है।

बांग्लादेश में जिन हिंदू और ईसाई परिवारों पर हमले हुए हैं, वे किसी भारतीय नीति, किसी राजनीतिक बयान या किसी वैचारिक बहस के पक्षकार नहीं हैं। वे वहां के नागरिक हैं और अल्पसंख्यक हैं। जब उनके साथ हो रही हिंसा को भारत की आंतरिक स्थिति से जोड़कर देखा जाता है, तो यह उनके साथ दूसरा अन्याय बन जाता है। पहला अन्याय हमले के रूप में हुआ, दूसरा तब जब उस हमले को किसी और देश की परिस्थितियों की प्रतिक्रिया कह दिया गया।

दिग्विजय सिंह ने अपने बयान में यह भी कहा कि वे बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हो रही हिंसा की निंदा करते हैं और वहां की अंतरिम सरकार को सख्त कदम उठाने चाहिए। लेकिन निंदा तब तक प्रभावी और ईमानदार मानी जाती है, जब तक वह बिना किसी शर्त और बिना किसी ‘लेकिन’ के हो। जैसे ही निंदा के साथ कारणों की व्याख्या जोड़ दी जाती है, उसका नैतिक बल कमजोर पड़ जाता है।

दिग्विजय सिंह का यह कहना कि हम हिंसा की निंदा करते हैं, लेकिन यह किसी प्रतिक्रिया का नतीजा है,असल में हिंसा को एक संदर्भ प्रदान करना है। यही वह बिंदु है जहां यह बयान खतरनाक हो जाता है। हिंसा को समझाने और उसे सही ठहराने के बीच की रेखा बहुत पतली होती है, और इस बयान में वह रेखा धुंधली पड़ जाती है।

भारत और बांग्लादेश की परिस्थितियों की तुलना करना भी इस बयान की एक बड़ी कमजोरी है। दोनों देशों की राजनीतिक संरचना, सामाजिक इतिहास और संवैधानिक ढांचा अलग है। भारत में अगर कहीं अल्पसंख्यकों के खिलाफ अपराध होते हैं, तो वे कानून-व्यवस्था के दायरे में आते हैं और उन पर न्यायिक प्रक्रिया लागू होती है। उन्हें किसी समुदाय के खिलाफ राज्य-नीति के रूप में परिभाषित नहीं किया जा सकता।

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमले वहां की आंतरिक राजनीति, सत्ता परिवर्तन, कट्टरपंथी समूहों की सक्रियता और सामाजिक तनावों से जुड़े हैं।

दिग्विजय सिंह जैसे नेता से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वे शब्दों के प्रभाव को समझें। वे कोई नए या अनुभवहीन राजनेता नहीं हैं। जब भारत का कोई नेता यह संकेत देता है कि पड़ोसी देश में अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा भारत की स्थिति की प्रतिक्रिया है, तो इससे एक गलत संदेश जाता है और यह संदेश न केवल भारत की छवि को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि उन ताकतों को भी तर्क देता है जो हिंसा को जायज़ ठहराने की कोशिश में रहती हैं। यही कारण है कि इस बयान को महज राजनीतिक विवाद कहकर टालना सही नहीं होगा।

इस बयान को किसी भी दृष्टि से स्वीकार नहीं किया जा सकता। न मानवीय आधार पर, न नैतिक आधार पर, न राजनीतिक और न ही कूटनीतिक आधार पर। हिंसा को कारणों की श्रृंखला में बांधकर देखने की प्रवृत्ति अंततः लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती है। सबसे बड़ा खतरा यह नहीं है कि यह बयान विवादों में है। असली खतरा यह है कि अगर ऐसे बयानों को सामान्य मान लिया गया, तो भविष्य में हर हिंसा के लिए कोई न कोई ‘रिएक्शन’ खोज लिया जाएगा। यही सोच समाज को संवेदनहीन बनाती है और पीड़ितों को हाशिये पर धकेल देती है।

बांग्लादेश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हमले गलत हैं,स्पष्ट, निर्विवाद और बिना किसी शर्त के। उनका कोई ‘रिएक्शन’ नहीं हो सकता। इस सच्चाई को स्वीकार करना ही लोकतांत्रिक और मानवीय दृष्टि की बुनियाद है और इसी कसौटी पर दिग्विजय सिंह का यह बयान पूरी तरह अस्वीकार्य ठहरता है। (विनायक फीचर्स)

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