ब्रांडिंग की चकाचौंध में दम तोड़ती आंकड़ों का सच्चाई

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ओंकारेश्वर पांडेय

 

             (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)

 

 

 ब्रांडिंग की चकाचौंध में दम तोड़ती आंकड़ों का सच्चाई

 

 

नारी शक्ति वंदन अधिनियम लाने के लिए मोदी सरकार का अभिनंदन करना चाहिए। इस अधिनियम को एकजुट इंडिया गठबंधन ने सदन में पारित नहीं होने दिया। विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि इसके पीछे मोदी सरकार की नीयत संविधान बदलने की थी। दरअसल देश के नारी पुरुष इसके पक्ष में तो हैं लेकिन झूठ और ढकोसले के पक्ष में अब नहीं हैं।

 

प्रधानमंत्री मोदी के अंतरात्मा की आवाज पर वोट देने की अपील के बावजूद इस बिल का गिरना एक बड़ा संकेत है।‌ मोदी सरकार ने यह मुद्दा संसद‌ में लाकर देश को‌ इसकी हकीकत जानने का अवसर भी दे‌ दिया और विपक्ष की एकजुटता ने सरकार को सतर्क रहने का सबक भी सिखाया।‌

 

जब देश के 21 राज्यों की पंचायतों में महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण मिल चुका है, तो मात्र 33% फीसदी आरक्षण वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम का नारा देने वालों की नीयत को समझना जरूरी है और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े भाजपा शासित राज्य की पंचायतों में महिला आरक्षण अभी तक 33 फीसदी ही क्यों?

 

महिलाओं को अधिकार देने और नारी नीत विकास का दावा सुनने में तो बड़ा अच्छा लगता है लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के इस “Ye-Man” (हाँ में हाँ मिलाने वाले) दौर के आंकड़ों की तुलना डॉ. मनमोहन सिंह के “Wo-Man” (Women focused) दशक से करते हैं, तो एक भयावह सत्य उभरता है।

 

क्या यह वास्तव में नारी का वंदन है, या 2029 और 2034 के चुनावों के लिए किया गया एक चतुर ‘चुनाव प्रबंधन’? विपक्ष को नारी विरोधी बताने से पहले आंकड़ों की सच्चाई भी देखना होगा।‌

 

अति मुखर मोदी सरकार के विज्ञापनों में 5 लाख करोड़ रुपये के “जेंडर बजट” का डंका जोर शोर से पीटा जाता है। लेकिन जब आप वित्त मंत्रालय द्वारा संसद में दिए गए लिखित जवाबों और बजट डिमांड नंबर 101 (महिला एवं बाल विकास मंत्रालय – MWCD) का विश्लेषण करते हैं, तो यह डंका फट जाता है। 2004-2014 में डॉ. मनमोहन सिंह ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का बजट ₹3,026 करोड़ (2004-05) से बढ़ाकर ₹18,584 करोड़ (2013-14) तक पहुँचाया था। यह 614% (6 गुणा से अधिक) की सीधी वृद्धि थी। बिना किसी मेगा-इवेंट के, पैसा सीधा जमीन पर काम करने वाले तंत्र (ICDS और आंगनवाड़ी) को दिया गया।

 

अगले 10 वर्षों में, मोदी सरकार ने इस बजट को ₹18,584 करोड़ से बढ़ाकर मात्र ₹26,092 करोड़ (2024-25) तक पहुँचाया। वृद्धि दर केवल 40%।

 

मुद्रास्फीति (Inflation) को जोड़ें तो आज की नारी को उसके हक का आधा भी नहीं मिल रहा। अगर मनमोहन सिंह की रफ़्तार और GDP के प्रति निवेश की प्रतिबद्धता जारी रहती, तो आज इस मंत्रालय का बजट ₹50,000 करोड़ से ₹60,000 करोड़ के बीच होना चाहिए था। यह कमी सीधे तौर पर कुपोषण और महिला सुरक्षा के बुनियादी ढांचे को कमजोर कर रही है।

5 लाख करोड़ के जेंडर बजट की ‘अकाउंटिंग बाजीगरी’

सरकार ने ‘जेंडर बजट’ के आंकड़े को ₹5.41 लाख करोड़ (2025-26) दिखाकर एक भ्रम पैदा किया है। यह समझना जरूरी है कि यह सारा पैसा महिलाओं के लिए नया निवेश नहीं है।

सरकार ने PM आवास योजना और PM किसान जैसी बड़ी योजनाओं के खर्च को जेंडर बजट में “टैग” कर दिया है। यदि एक घर महिला के नाम पर बना, तो घर की पूरी निर्माण लागत को महिला कल्याण में जोड़ दिया गया। यह “सशक्तिकरण” नहीं, बल्कि पुरानी योजनाओं को नया चश्मा पहनाना है।

2025-26 के संशोधित अनुमान (RE) बताते हैं कि घोषणा ₹4.49 लाख करोड़ की हुई थी, लेकिन वास्तव में खर्च में ₹51,000 करोड़ की कटौती की गई। यानी प्रचार 5 लाख करोड़ का, और जेब में कटौती अरबों की।

 

विज्ञापन में ‘बेटी बचाओ’, हकीकत में ‘चेहरा चमकाओ’योजना रही। ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ योजना इस सरकार के प्रचार तंत्र का सबसे बड़ा उदाहरण है। संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट के अनुसार “2014 से 2019 के बीच इस योजना के लिए जारी कुल फंड का 56% से अधिक हिस्सा केवल विज्ञापनों और प्रचार पर खर्च कर दिया गया।”

 

स्मृति ईरानी ने स्वयं संसद में स्वीकार किया था कि विज्ञापनों पर करोड़ों रुपये लगाए गए। जब पैसा बेटियों की शिक्षा और स्वास्थ्य के बजाय प्रधानमंत्री की फोटो वाले होर्डिंग्स पर खर्च होता है, तो यह ‘वंदन’ नहीं, बल्कि ‘विपणन’ (मार्केटिंग) बन जाता है।

 

मोदी -1 में हारकर भी मंत्री बनायीं गयीं स्मृति ईरानी अब मोदी -3 में खुद हाशिए पर हैं। केवल वही नहीं, मोदी 2 की कई अन्य महिला मंत्री जैसे मीनाक्षी लेखी,साध्वी निरंजन ज्योति, दर्शना जरदोश आदि मौजूदा सरकार में बाहर हैं।

सत्ता के सर्वोच्च शिखर से महिलाएं ‘अदृश्य’ हैं।

 

नारी वंदन के नारों के बीच यह तथ्य चौंकाने वाला है कि सत्ता के सबसे ताकतवर केंद्रों में महिलाओं की उपस्थिति नगण्य है।

 

 

नियुक्ति समिति (ACC) भारत सरकार की सबसे शक्तिशाली समिति, जो देश के सभी शीर्ष पदों (सीबीआई निदेशक, सचिव, बैंकिंग प्रमुख) का फैसला करती है, उसमें शून्य (0) महिला है। इसमें केवल दो पुरुष सदस्य हैं प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह।

 

देश की टॉप 8 कैबिनेट समितियों में से एक की भी अध्यक्षता कोई महिला नहीं करती। निर्मला सीतारमण जैसे चेहरे केवल “सदस्य” के रूप में मौजूद हैं, कमान आज भी पुरुष प्रधान के पास है।

राष्ट्रीय महिला आयोग जैसे संवैधानिक निकायों में रिक्तियां महीनों तक बनी रहती हैं, जिससे शिकायतों का अंबार लगा रहता है। यह ‘वंदन’ है या संस्थागत ‘रुदन’? तो महिला वंदन’ के नारे की असली जमीनी हकीकत क्या है

33% आरक्षण का वादा 2024 चुनाव में सिर्फ 9.7% महिला मंत्री।

‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ का 56% फंड सिर्फ विज्ञापनों पर खर्च।

 ‘नारी शक्ति’ का नारा लेकिन कैबिनेट सुरक्षा समिति में आज सिर्फ एक महिला (निर्मला सीतारमण)।

 

नारियों को समाज से लेकर सत्ता तक समान अधिकार देने को लेकर लगभग सभी दलों और पुरुषों में आम सहमति है। देश में नारी-विकास से आगे नारी सशक्तिकरण और उससे भी आगे बढ़कर नारी-नीत (Women Led) विकास की बात हो चुकी है। कांग्रेस ने तो इस नारे से दशकों पहले इस देश को इंदिरा गांधी को नेतृत्व देकर और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी को बनाकर नारी-नीत विकास की अमिट लंबी रेखा खींच डाली थी।

 

नारी शोषण और गंभीर अपराध की वैश्विक प्रतीक बनीं एप्सटीन फाइलों से लेकर मणिपुर तक देश भर में नारियों के क्रंदन के बीच जब मोदी सरकार नारी शक्ति वंदन की बात करती है, तो उसकी नीति और नीयत में फ़र्क साफ हो जाता है।

 

क्या यह अधिनियम महिला वंदन है या मीडिया प्रबंधन? क्या यह नारी शक्ति को बढ़ाने का गंभीर प्रयास है, या चुनावी शक्ति को बढ़ाने का? मणिपुर महिलाएं फिर सड़कों पर मशालें लेकर क्रंदन करतीं दिखीं। उनके आंसुओं की पीड़ा और क्रंदन के बीच देश की चयनित आमंत्रित महिलाओं के बीच मुस्कुराते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महिला प्रेम की नीतियां और नीयत का मुखौटा आंकड़ों की असलियत के आईने में टूटकर कांच के टुकड़ों की तरह बिखर जाता है।

 

परिसीमन (Delimitation) और गेरीमैंडरिंग को लेकर बंटे विपक्ष की आंखों में धूल झोंकने के लिए मोदी सरकार ने बड़ी चटक चतुराई से 2023 के अधिनियम में एक ‘टाइम बम’ फिट किया है। आरक्षण तब लागू होगा जब जनगणना और परिसीमन पूरा होगा। इसके पीछे का मकसद बेहद गहरा है।

 

विपक्ष का तर्क है कि अगर पंचायतों में बिना परिसीमन के 50% आरक्षण मिल सकता है (जैसा बिहार ने 2006 में किया), तो संसद में 33% के लिए 2029 या 2034 तक इंतजार क्यों?

 

  ‘गेरीमैंडरिंग’ यानी चुनाव जीतने के लिए निर्वाचन क्षेत्रों के नक्शे के साथ चालाकी करना। इस पर विपक्ष को डर है कि परिसीमन के दौरान उन सीटों को ‘महिला आरक्षित’ कर दिया जाएगा जहाँ विपक्षी पुरुष नेता मजबूत हैं, ताकि उन्हें राजनीतिक रूप से खत्म किया जा सके।

 

परिसीमन जनसंख्या के आधार पर होगा, जिससे उत्तर भारत की सीटें बढ़ेंगी। राहुल गांधी का संदेह जायज लगता है कि आरक्षण के नाम पर दक्षिण भारत और पिछड़ों (ओबीसी) की राजनीतिक हिस्सेदारी का “हिस्सा चोरी” किया जा रहा है।

नारी सुरक्षा की बात करने वाली पार्टियों का चरित्र 2024 के चुनाव में खुलकर सामने आया। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) के आंकड़ों के अनुसार 18वीं लोकसभा में 46% सांसदों पर आपराधिक मामले हैं। 31% पर गंभीर आपराधिक मामले हैं, जिनमें महिलाओं के खिलाफ हिंसा और बलात्कार के आरोपी भी शामिल हैं।

बीजेपी में महिला विरोधी अपराधों के आरोपी सांसदों और विधायकों की संख्या (54) सबसे अधिक है।

इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने ‘नारी शक्ति’ की जो लकीर खींची है, उसे बीजेपी आज तक नहीं छू पाई है।

 

श्रीमती इंदिरा गांधी के रुप में ऐसा महिला नेतृत्व था, जिन्होंने 1971 में बिना किसी इवेंट मैनेजमेंट के पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए। आज जब मोदी सरकार अमेरिकी दबाव (ट्रम्प शासन) के आगे रणनीतिक स्वायत्तता खोती दिखती है, तो इंदिरा की वह ‘शक्ति’ याद आती है जिसने दुनिया के नक्शे को बदल दिया था।

प्रतिभा पाटिल के रुप में देश को पहली महिला राष्ट्रपति देने का श्रेय कांग्रेस को जाता है।

उत्तर प्रदेश में पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी को कांग्रेस ने बनाया था।

कांग्रेस की शीला दीक्षित ने 15 साल शासन किया और दिल्ली को विकास की नयी ऊंचाई दी।

 

1993 में राजीव गांधी द्वारा लाया गया 73वां और 74वां संविधान संशोधन ही वह आधार था जिसने आज 21 राज्यों में महिलाओं को 50% आरक्षण दिया है इसीलिए जब राहुल गांधी ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ की खामियों पर उंगली उठाते हैं, तो उनका डर वास्तविक लगता है। वह पूछते हैं कि अगर नीयत साफ है, तो आज क्यों नहीं? अगर नीयत साफ है, तो ओबीसी कोटा क्यों नहीं?

 

   “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” एक खूबसूरत लिफाफा है जिसके अंदर ‘परिसीमन’ और ‘देरी’ की कड़वी गोलियां छिपी हैं। मनमोहन सिंह के दौर में बजट महिला सशक्तिकरण के लिए था, आज का बजट प्रधानमंत्री की वाह-वाही के लिए है।

 

पंचायतों में तो हमने महिलाओं को 50% तक पहुँचा दिया, लेकिन दिल्ली की सत्ता के गेट पर आज भी जनगणना और परिसीमन के ताले लटके हैं। जब तक सत्ता के असली केंद्रों (ACC और कैबिनेट समितियों) में महिलाएं नहीं होंगी, और जब तक बजट का 56% विज्ञापनों पर खर्च होगा, तब तक भारत की बेटियाँ ‘वंदन’ नहीं, ‘रुदन’ ही करेंगी।

 

संसद के विशेष सत्र (17 अप्रैल 2026) के दौरान सत्ता पक्ष ने ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को क्या इसलिए सबसे बड़ी ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में पेश किया कि ममता बनर्जी नीत तृणमूल कांग्रेस को हराया जाय? जम्मू कश्मीर में मेहबूबा मुफ्ती भाजपा के साथ सरकार बनाकर सत्ता खो चुकी हैं।

 

भाजपा की वरिष्ठ नेता वसुंधरा राजे खामोश हैं। सुमित्रा महाजन के लिए उम्र का प्रश्न है।

 

आनंदीबेन को ‘बेटी’ कहा उन्हें 75 साल में ‘बूढ़ी’ कहकर बाहर किया। आनंदीबेन पटेल अभी राज्यपाल हैं। पर किस्सा उनके वंदन का है। साल था 2014, नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। गुजरात की गद्दी उनकी सबसे वफादार साथी आनंदीबेन पटेल को सौंपी गई। वह गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। भाजपा ने उन्हें ‘माँ’ और ‘शक्ति का प्रतीक’ बताया लेकिन फिर अचानक क्या हुआ? मात्र दो साल बाद, 7 अगस्त 2016 को आनंदीबेन को ‘स्वास्थ्य कारणों’ का हवाला देकर इस्तीफा देने को कहा गया। उस समय उनकी उम्र 75 वर्ष थी लेकिन अपने मामले में अब मोदी सरकार के लिए उम्र कोई बाधा नहीं। मोहन भागवत ने यह सवाल उठाया, तो उन्हीं को पहले रिटायर होने की नसीहत दे दी गयी, जबकि वे किसी संवैधानिक पद पर नहीं हैं।

 

यह समय नारों से ऊपर उठकर आंकड़ों के सच को देखने का है क्योंकि असली सशक्तिकरण होर्डिंग्स पर फोटो छपवाने से नहीं, बल्कि संसद में कुर्सी देने और बजट में हिस्सा देने से आता है।

 

एक तरफ ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ और परिसीमन के नाम पर महिलाओं को 33% आरक्षण का वादा किया जा रहा है। दूसरी तरफ, उसी सरकार के हाथों वही महिला नेता अपमानित हो रही हैं, जिन्हें कभी मंच से ‘बेटी-बहन’ कहकर संबोधित किया जाता था।

 

लेकिन क्या यह सब सिर्फ एक नाटक है? क्या ‘महिला वंदन’ के इस मीठे लिफाफे में कोई जहर भी छिपा है? तीन विधेयक एक साथ लाना, विपक्ष को भ्रमित करना, और फिर संविधान के 130वें संशोधन जैसे अज्ञात हथियार को तैनात करने की तैयारी,यह सब एक बड़ी राजनीतिक सर्जरी की तरह लगता है।

 

यह लेख उसी ‘एनेस्थीसिया’ (संज्ञाहरण) को उजागर करता है, जिसमें विभाजित विपक्ष को धीरे-धीरे ‘कोमा’ में भेजने की तैयारी है। संदेश साफ है – बंटोगे तो कटोगे।

 

एक पंक्ति में कहें तो “नारी वंदन का लिफाफा फाड़कर देखो, तो अंदर से निकलेगा ‘संविधान का अंतिम संस्कार’ और ‘विपक्ष की चिता’।”

 

और हाँ, आनंदीबेन को भाजपा ने इसलिए हटाया क्योंकि वह ‘मोदी-शाह’ की ‘हाँ में हाँ’ नहीं मिलाती थीं। उम्र तो बहाना था। असली वजह थी ‘स्वतंत्र सोच’ और वही स्वतंत्र सोच आज पूरे विपक्ष का गला घोंट रही है।

 

संसद में विपक्षी दलों की गोलबंदी और एक संवेदनशील विधेयक का गिर जाना यह साफ संकेत देता है कि आनेवाले दिनों में सरकार की मुश्किलें बढ़ेंगी। पार्टी और संघ को भीतर‌ और बाहर सरकार के तानाशाही रवैये और दमनकारी नीतियों ने मोदी सरकार को तलवार की धार पर ला दिया है।   (विनायक फीचर्स)

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