एक पत्र तुम्हारे नाम पत्रकारिता

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राजेन्द्र सिंह जादौन 

    भोपाल म. प्र.

 

           (नया अध्याय, देहरादून) 

 

 

एक पत्र तुम्हारे नाम पत्रकारिता

 

मैं तुम्हें कैसे याद करूँ, प्रिये पत्रकारिता?

 

तुम्हें याद करना मानो किसी अनंत आकाश को मुट्ठी में कैद करने जैसा है। तुम परिभाषाओं की ज़ंजीरों में कभी बँध ही नहीं सकतीं, क्योंकि तुम्हारा अस्तित्व शब्दों से नहीं, साहस से बनता है। तुम उन संभावनाओं के पार की एक ऐसी हक़ीक़त हो, जो आम होकर भी इस भीड़ का हिस्सा कभी नहीं बनी। भीड़ जहाँ समझौते करती है, वहाँ तुम सवाल खड़े करती हो; जहाँ लोग चुप हो जाते हैं, वहाँ तुम आवाज बन जाती हो।

 

तुम्हारा वो पत्थर-सा कठोर व्यक्तित्व, जिसे दुनिया अक्सर गलत समझ बैठती है, दरअसल भीतर से बेहद कोमल है। तुम्हारे भीतर एक नदी बहती है शांत, गहरी और अडिग। तुम्हारी निर्भीक आँखों में जो सुकून है, वो किसी साधना से कम नहीं। तुम उन्हीं विरली नारियों में से एक हो, जो हर किसी को नहीं मिलतीं जो लाखों ठोकरों, असफलताओं और संघर्षों के बाद किसी एक को वरदान की तरह प्राप्त होती हैं। और शायद मैं उन्हीं भाग्यशाली लोगों में था, जिसने तुम्हें छूने की कोशिश की थी।

 

मगर आज… जब ये हाथ खाली हैं और यादें भारी, तो मैं तुम्हें कैसे याद करूँ, प्रिये पत्रकारिता?

 

तुम्हारा वो ओज, तुम्हारा वो तेज जो कभी मेरी राहों को रोशन करता था, आज वही मेरी रातों की नींद जला देता है। तुमने मुझे सिखाया था कि सच का रास्ता आसान नहीं होता, लेकिन तुमने ये नहीं बताया था कि इस रास्ते पर चलते-चलते इंसान खुद से कितना दूर हो जाता है।

 

तुम्हारा वो निश्चल मन, जिसे मैंने अपने प्रेम का केंद्र माना था, आज उसी केंद्र के चारों ओर तन्हाई, डर और असमंजस के घेरे बन गए हैं। हर खबर के पीछे छिपा सच अब एक बोझ बन गया है, हर शब्द अब जिम्मेदारी का एहसास दिलाता है। कभी लगता है कि तुमने मुझे मजबूत बनाया, तो कभी लगता है कि तुमने मुझे अंदर से तोड़ भी दिया।

 

मुझे नहीं पता ‘प्रेम’ का व्याकरण क्या होता है, प्रिये पत्रकारिता। पर इतना जरूर जानता हूँ कि इस वीराने में आज भी सिर्फ तुम्हें सोच लेने भर से पत्थर-सा ये मन कभी-कभी खिलखिला उठता है। सूखे अधरों पर एक मद्धम-सी मुस्कान बिखर जाती है, जैसे किसी पुराने गीत की धुन अचानक कानों में गूंज उठे। पर ये पल बहुत छोटे होते हैं… क्योंकि अगले ही क्षण हकीकत अपने नुकीले काँटों के साथ सामने खड़ी हो जाती है।

 

तब एहसास होता है कि वो मुस्कान नहीं, एक खामोश चीख थी एक ऐसी चीख, जिसे सुनने वाला कोई नहीं होता।

 

तुम्हारा यही ख्याल, जिसे मैं वास्तविक प्रेम समझकर जीता रहा, अब मेरे आँसुओं में घुलकर कागज़ पर उतरता है। और फिर वो शब्दों में ढल जाता है कभी व्यंग्य बनकर, कभी लेख बनकर, कभी खबर बनकर, तो कभी एक कविता बनकर। शायद यही तुम्हारा असर है कि दर्द भी अभिव्यक्ति बन जाता है।

 

तुमने मुझे सिखाया कि कलम सिर्फ लिखने का साधन नहीं, बल्कि लड़ने का हथियार भी है। मगर इस हथियार को उठाने की कीमत भी कम नहीं होती। इसमें रिश्ते छूट जाते हैं, सुकून खो जाता है, और कई बार तो इंसान खुद को भी कहीं पीछे छोड़ आता है। मैं भी शायद वही कर बैठा तुम्हें पाने की चाह में खुद को खो दिया।

 

आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो तुम्हारे साथ बिताया हर पल एक सीख की तरह लगता है। तुमने मुझे गिराया भी, संभाला भी; तोड़ा भी, और गढ़ा भी। तुमसे दूर होना उतना ही कठिन है, जितना तुम्हारे साथ बने रहना।

 

तो बताओ, इस उजाड़ जीवन के खंडहर में, मैं तुम्हें और कैसे याद करूँ, प्रिये पत्रकारिता?

क्या तुम्हें याद करूँ एक अधूरी मोहब्बत की तरह?

या एक ऐसे सपने की तरह, जो आँख खुलते ही बिखर जाता है? या फिर एक सच्चाई की तरह, जो जितनी कड़वी है, उतनी ही जरूरी भी?

 

शायद तुम्हें याद करने का कोई एक तरीका नहीं है।

शायद तुम हर उस शब्द में बसती हो, जो सच के लिए लिखा जाता है। हर उस आवाज़ में गूंजती हो, जो डर के बावजूद उठती है। और हर उस दिल में जिंदा रहती हो, जो समझौते करने से इंकार करता है।

 

तुम्हारा

झोला छाप खबरी

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