राजेंद्र रंजन गायकवाड
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड)
बौद्ध कथा
पहचान,,
एक समय की बात है उत्तर भारत के एक शांत वन में बुद्ध भगवान विहार कर रहे थे। उनके साथ अनेक भिक्षु भी थे। एक दिन एक युवक भिक्षु, जिसका नाम सुमन था, अत्यंत दुखी दिखाई दिया।
बुद्ध ने पूछा, “सुमन, तुम्हारे चेहरे पर इतनी उदासी क्यों है?”
सुमन ने हाथ जोड़कर कहा, “भगवान, मैं वर्षों से धर्म का अभ्यास कर रहा हूँ। मैंने बहुत से लोगों को शिक्षा दी है, कई स्थानों पर जाकर धर्मोपदेश किया है। फिर भी… लोग मुझे कम ही पहचानते हैं। आसपास के गाँवों में भी मेरा नाम बहुत कम लोग जानते हैं। जबकि कुछ अन्य भिक्षुओं को दूर-दूर तक जाना जाता है। मेरा मन बार-बार यही सोचता है ,, क्या मैं असफल हूँ?” मेरी कोई पहचान नहीं ?
बुद्ध मुस्कुराए। वे सुमन को लेकर एक छोटे से तालाब के किनारे गए। तालाब में कमल के फूल खिले हुए थे कुछ कमल पूर्ण रूप से खिले थे, कुछ अभी कली में और कुछ पानी के नीचे छिपे हुए थे। बुद्ध ने एक पूर्ण खिला हुआ कमल उठाया और कहा,
सुमन, देखो इस फूल को कितने लोग इसे पहचानते हैं? कोई गिनती नहीं कर सकता। परंतु प्रश्न यह नहीं है कि कितने लोग इसे जानते हैं। प्रश्न यह है वे इसे क्यों जानते हैं?
कुछ लोग इसे इसलिए पहचानते हैं क्योंकि यह सुंदर है। कुछ इसलिए क्योंकि इसकी सुगंध मन को शांत करती है। कुछ इसलिए क्योंकि यह कीचड़ में खिलकर भी निर्मल रहता है।
और कुछ इसलिए क्योंकि यह उन्हें जीवन का सत्य याद दिलाता है कि कठिनाई में भी शुद्धता संभव है।
फिर बुद्ध ने पानी के नीचे छिपा हुआ एक छोटा सा अंकुर दिखाया और कहा, यह अंकुर अभी किसी को दिखाई नहीं देता कोई इसे नहीं पहचानता। परंतु जब यह खिलेगा, तब भी उसकी पहचान उसके रूप, रंग या सुगंध से होगी उसकी लोकप्रियता से नहीं।
सुमन, लोग तुम्हें इसलिए पहचानें कि तुम सत्य बोलते हो, करुणा रखते हो, और दूसरों के दुख को हल्का करते हो यह महत्वपूर्ण है।
यदि लोग तुम्हें इसलिए पहचानें कि तुम प्रभावशाली हो, या तुम्हारा नाम बड़ा है, या तुम बहुत बोलते हो तो वह पहचान खोखली है।
कितने लोग जानते हैं यह बाहरी बात है।
वे क्यों जानते हैं यह आंतरिक बात है।
और आंतरिक बात ही धम्म है।”
सुमन चुपचाप बैठा रहा उसकी आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर शांति थी। उस दिन से सुमन ने नाम और पहचान की चिंता छोड़ दी। वह जहाँ भी जाता, केवल करुणा से बोलता, केवल सत्य से चलता। धीरे-धीरे लोग उसे पहचानने लगे न तो उसके नाम के कारण, न उसके उपदेशों की संख्या के कारण, बल्कि इसलिए कि उसके पास बैठने से मन शांत हो जाता था।
बहुत वर्षों बाद जब सुमन वृद्ध हो गए, एक गाँव का बच्चा उनसे पूछा, “बाबा, आपको इतने लोग क्यों जानते हैं?”
सुमन ने मुस्कुराकर उत्तर दिया,
“बेटा, कितने लोग जानते हैं यह महत्वपूर्ण नहीं। वे मुझे क्यों जानते हैं यही सोचने और समझने की बात है। यदि वे मुझे इसलिए जानते हैं कि मैंने किसी के मन में थोड़ी सी खुशी दी है तो यही मेरा पूरा जीवन है।
नाम प्रसिद्धि की मात्रा महत्व नहीं रखती।
प्रसिद्धि का कारण महत्व रखता है।
क्योंकि कारण ही वह बीज है, जिससे कर्म और मुक्ति दोनों उगते हैं। आज अनेक जन – प्रतिनिधि बहुत प्रसिद्ध हैं,, क्या सचमुच प्रसिद्धि के अनुरूप कार्य करते हैं? या पूंजीपतियों के गुलाम होकर उनके ही हितों की रक्षा करते हैं?






