संजय सोंधी (संयुक्त निदेशक) शिक्षा निदेशालय दिल्ली सरकार
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w)6395080071
पश्चिम एशिया संकट और भारत की रणनीतिक सक्रियता: केवल बयानो से आगे बढ़ने की आवश्यकता।
पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और यमन के हूती विद्रोहियों के बीच गहराता तनाव एवं व्यापक संघर्ष संपूर्ण लाल सागर और अदन की खाड़ी के समुद्री व्यापार मार्ग को भारी संकट में डाल चुका है। ऐसे वैश्विक संकट के बीच भारत के लिए केवल औपचारिक बयान जारी करने या तटस्थता का रुख अपनाने के बजाय एक अधिक सक्रिय (Proactive) और व्यावहारिक कूटनीतिक दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य हो गया है। पश्चिम एशिया में भारत के व्यापक रणनीतिक, आर्थिक और मानवीय हित दांव पर लगे हैं, जिन्हें सुरक्षित रखने के लिए बहुस्तरीय कूटनीतिक और सुरक्षात्मक पहल आवश्यक है।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा मुख्य रूप से इसी क्षेत्र पर निर्भर है, क्योंकि देश अपनी आवश्यकता का लगभग 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, जिसमें से करीब 50 से 55 प्रतिशत आपूर्ति सऊदी अरब, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और आसपास के देशों से होती है। बाबल-अल-मंदेब जलडमरूमध्य और लाल सागर के रास्तों पर हूती हमलों के कारण जहाजों को उत्तमाशा अंतरीप (Cape of Good Hope) का लंबा मार्ग चुनना पड़ रहा है, जिससे माल ढुलाई की लागत और समुद्री बीमा प्रीमियम में भारी वृद्धि हुई है।
दूसरा प्रमुख पहलू वहां रह रहे 85 लाख से अधिक भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा का है, जो हर साल लगभग 40 से 45 अरब डॉलर का विप्रेषण (Remittance) भारत भेजते हैं, जो देश के कुल रेमिटेंस का एक बड़ा हिस्सा है।
तीसरा, सामरिक दृष्टि से भारतीय नौसेना अदन की खाड़ी और अरब सागर में वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा के लिए गश्त लगा रही है, लेकिन समुद्री सुरक्षा को स्थायी बनाने के लिए क्षेत्रीय शक्तियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर सक्रिय कूटनीति का संचालन करना समय की मांग है।
पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता भारत के अपने आर्थिक विकास, आपूर्ति श्रृंखला की मजबूती और प्रवासी सुरक्षा के साथ सीधी जुड़ी हुई है, इसलिए भारत को इस संघर्ष में मध्यस्थता और कूटनीतिक पहल के लिए आगे आना होगा।






