युगपुरुष सूर्य जी
(नया अध्याय, उत्तराखण्ड) (w) 6395080071
विचारोत्तेजक लेख:
निष्ठुर युग में सहृदय होना : युगपुरुष सूर्य जी
यह संसार गतिशील है, किन्तु आज इसमें संवेदनशीलता, मानवीय मूल्यों और सच्चे आधुनिकता-बोध का अभाव होता जा रहा है। समाज में एकता और सद्भावना की बुनियाद को मजबूत करने के लिए ही समय-समय पर संतों, पैगम्बरों और अवतारों का अवतरण हुआ। इसी महान परंपरा में कबीर हुए, जिन्होंने सामाजिक रूढ़ियों पर प्रहार करते हुए एकता और सद्भावना का मार्ग दिखाया। हम सब भले ही लोक-कल्याण की कामना रखते हों, पर आज की दुनिया की कठोरता और संवेदनहीनता की कड़वी सच्चाई को भुलाया नहीं जा सकता।
ऐसा प्रतीत होता है जैसे मनुष्य के भीतर से सहवेधना मर चुकी है। इस निष्ठुर संसार में आज हर कोई खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। यह युग भौतिकता की चकाचौंध में कठोर हृदय होते जा रहे लोगों से भरा है। ऐसे संवेदनहीन समय में केवल भावुक या सहृदय बने रहना ही काफी नहीं है, क्योंकि ऐसी दुनिया में संवेदनशीलता को कमजोरी समझ लिया जाता है। इसलिए, जहाँ एक ओर हमें इस बेरहम माहौल से अपनी आंतरिक शांति को बचाकर रखना है, वहीं दूसरी ओर मनुष्य में मानवता को पुनर्जीवित करने के लिए निरंतर प्रयास भी करने होंगे।
आज लोग बाह्य आडंबरों, कर्मकांडों और पूजा-पाठ में उलझे हैं। जब हम कबीर की भाँति इन कुप्रथाओं और दिखावे का विरोध करते हैं, तो लोग आक्रोशित हो जाते हैं। सत्य तो यह है कि ईश्वर किसी मंदिर-मस्जिद में नहीं, बल्कि सर्वव्यापी है। मनुष्य को आज बाहरी धार्मिक कर्मकांडों की नहीं, बल्कि ‘आत्म-बोध’ की परम आवश्यकता है। विडंबना यह है कि आज का इंसान आधुनिक बनने की होड़ में पूरी दुनिया को तो जान रहा है, पर खुद को ही भूलता जा रहा है।
संसार के तमाम मनीषियों और दार्शनिकों का भी यही मत रहा है।…परिस्थितियाँ चाहे जैसी हों, खुद को खोना मत, अपना सकारात्मक जुनून बनाए रखना। बाहरी उथल-पुथल से विचलित हुए बिना, संसार के विकारों पर ध्यान देने के बजाय अपने सद्मार्ग पर अविरल चलते जाओ और नेकी करते चलो। जब आप स्वयं में मानवीय बने रहेंगे, तभी इस दुनिया को सुंदर और रहने योग्य बनाया जा सकता है। यही डूबती हुई मानवता को बचाने का एकमात्र मार्ग है।
(यह लेख गहरी दार्शनिकता से ओत-प्रोत और विचारात्मक है! यह आदर्श व्यक्तित्व के धनी, महान हिंदी साहित्यकार, आध्यात्मिक दार्शनिक, मानवतावादी सुधारक तथा संस्कृति एवं समरसता के संरक्षक युगपुरुष ‘सूर्य जी’ द्वारा रचित है।)






