समान नागरिक संहिता

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               कुलदीप सेमवाल (एडवोकेट)  देहरादून
        समान नागरिक संहिता
          समान नागरिक संहिता की चर्चा पिछले काफ़ी समय  से पूरे देश में जोरो शोरो से चल रही है ,अलग अलग बुद्धीजीवियों कै अलग अलग विचार समान नागरिक संहिता कै संदर्भ में देश के सामने रखे जा रहे हैं किंतु इस विषय पर कोई रास्ता निकल पाना काफ़ी कठिन हो चुका था किन्तु अब इस विषय में देश  कै सभी नागरिकों द्वारा  एक सरल ,सुदृढ़ रास्ता ढूंढ निकाला है । किंतु इस पर  चर्चा करने से पूर्व हमें यह जानना बेहद ज़रूरी है कि समान नागरिक संहिता आख़िर में है क्या और इसकी क्या महत्वत् है।
             समान नागरिक संहिता का भारतीय संविधान कै नीति निर्देशक तत्व (directive principles of state policy )में अनुच्छेद 44  मे वर्णन किया हुआ है समान नागरिक संहिता क़ानून के एक सामान्य समूह को दर्शाती है जो देश के सभी नागरिकों को विवाह ,तलाक़ ,विरासत ,गोद लेने की प्रक्रिया ,उत्तराधिकार संबंधी प्रक्रिया आदि विषय मे लागू की जाती है यदि  संविधान के अनुच्छेद 44 को पढ़ा जाए तो वहाँ पर सरल शब्दों में वर्णन है /समान नागरिक संहिता को लेकर यह प्रावधान है कि राज्य समान नागरिक संहिता को लागू कराने की शक्ति  रखता है इसका उद्देश्य धर्म के आधार पर किसी भी वर्ग विशेष के साथ होने वाले भेदभाव व पक्षपात को ख़त्म करना है।
        समान नागरिक संहिताका महत्व 
समान नागरिक संहिता क़ी महत्त्वता लोकतांत्रिक देशों में काफ़ी अहम हो जाती है यहाँ हर धर्म का व्यक्ति अपनी बात को समाज में रख सकता है क्योंकि  हर धर्म के व्यक्ति को समान आधिकार प्राप्त हैं।समान नागरिक संहिता की भौगोलिक विषय पर चर्चा की जाए तो संयुक्त राष्ट्र के193 सदस्य देशों में से केवल 8 देशों में समान नागरिक  संहिता लागू है,जिसमें अमेरिका ,पाकिस्तान ,बांगलादेश,मलेशिया,टर्की,इंडोनेशिया, मिस्र, आयरलैंड जैसे देश शामिल  है ।भारत में भी समान नागरिक संहिता को संपूर्ण देश में लागू करने का प्रयास सरकार  द्वारा किया जा रहा है ,वर्तमान में भारत  का  गोवा  राज्य एकमात्र राज्य है जहाँ पूर्ण रूप से समान नागरिक संहिता पहले से ही प्रचलन मैं  है ।हाल ही में उत्तराखंड विधानसभा में भी समान नागरिक संहिता विधेयक पारित हो गया है इसके साथ ही उत्तराखंड  समान नागरिक संहिता विधेयक पास करने वाला भारत का  का पहला राज्य बन गया  है दिनांक 6/2/2024 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने विधानसभा में समान नागरिक संहिता विधेयक रखा जिसे सर्वसम्मति से पास किया गया किन्तु राज्य की अनुसूचित जनजातियों को इस क़ानून के दायरे से अभी भी बाहर रखा गया है जिससे सभी नागरिकों के लिए क़ानून में एक रूपता के दावे पर एक  प्रश्नचिन्ह उत्पन हो रहा है।
समान नागरिक संहिता का नकारात्मक दृष्टिकोण :
       समान नागरिक  संहिता का  पूरा देश ज़ोर शोर से स्वागत  कर रहा है किन्तु कुछ बुद्धिजीवियों का यह भी तर्क है कि समान नागरिक संहिता समानता ,सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने का मात्र एक काल्पनिक स्रोत है किन्तु इसके संभावित नुक़सान में अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए ख़तरा ,संस्कृतिक संवेदनशीलता और सामाजिक अशांति की संभावना उत्पन्न हो सकती  है किन्तु इस विषय पर  तर्क रखने वाले व्यक्तियों की संख्या काफ़ी कम है जिस कारण समान नागरिक संहिता के संदर्भ मैं सीधा सीधा नकारात्मक कटाक्ष किया जाना संभव नहीं हैं।
समान नागरिक संहिता का उद्देश्य :
          समान नागरिक  संहिता का उद्देश्य मुख्यतः राष्ट्रीय एकता और धर्मनिरपेक्षता के आधार पर  सभी नागरिकों के बीच एक समान पह्चान और अपनेपन की भावना पैदा करके राष्ट्रीय एकता एवं धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देना, लैंगिक न्याय और समानता के आधार पर विभिन्न व्यक्तिगत क़ानून(personal law )के अंतर्गत महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव और उत्पीड़न को दूर  करके लैंगिक समानता समाज में स्थापित करना ,पूर्व से चली आ रही प्रथाओं को नवीनीकरण और सुधार करके प्रचलित पुरानी प्रथाओ का आधुनिकीकरण और इन प्रथाओं में सुधार करना विशेष तौर पर उन प्रथाओं को समाप्त करना भी समान नागरिक संहिता का प्रमुख उद्देश्य है जो संविधान में वर्णितअधिकारों केविपरीत है उदाहरण के लिए तीन तलाक़ ,बहुविवाह बालविवाह जैसे प्रथाओं को समाज के उज्ज्वल भविष्य के लिए सामज से मिटाना
और एक सुदृढ़ समाज को स्थापित करना ताकि सभी ध्रमों के लोग एक जुटता के साथ  समानता का उदाहरण आने वाली पीडियो के लिए स्थापित कर सके।
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