फूट-कलह ने खींच दी, आँगन में दीवार

Spread the love

डॉo सत्यवान सौरभ, हिसार, हरियाणा

फूट-कलह ने खींच दी, आँगन में दीवार

(आखिर क्यों बदल रहे हैं मनोभाव और टूट रहे परिवार?)

(भौतिकवादी युग में एक-दूसरे की सुख-सुविधाओं की प्रतिस्पर्धा ने मन के रिश्तों को झुलसा दिया है। कच्चे से पक्के होते घरों की ऊँची दीवारों ने आपसी वार्तालाप को लुप्त कर दिया है। पत्थर होते हर आंगन में फ़ूट-कलह का नंगा नाच हो रहा है। आपसी मतभेदों ने गहरे मन भेद कर दिए है। बड़े-बुजुर्गों की अच्छी शिक्षाओं के अभाव में घरों में छोटे रिश्तों को ताक पर रखकर निर्णय लेने लगे है। फलस्वरूप आज परिजन ही अपनों को काटने पर तुले है। एक तरफ सुख में पडोसी हलवा चाट रहें है तो दुःख अकेले भोगने पड़ रहें है. हमें ये सोचना -समझना होगा कि अगर हम सार्थक जीवन जीना चाहते है तो हमें परिवार की महत्ता समझनी होगी और आपसी तकरारों को छोड़कर परिवार के साथ खड़ा होना होगा तभी हम बच पायंगे और ये समाज रहने लायक होगा)

आज सभी को एक संस्था के रूप में पारिवारिक मूल्यों और परिवार के बारे में सोचने-समझने की बेहद सख्त जरूरत है और साथ ही इन मूल्यों की गिरावट के कारण ढूंढकर उनको दुरुस्त करने की भी जरूरत है। इसके लिए समाज के कर्णधार कवि/लेखकों/गायकों/ नायक/नायिकाओं/शिक्षक वर्गों और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ-साथ राजनीतिज्ञों को एक संस्था के रूप में परिवार के पतन के निहितार्थ के बारे में भी लिखना और सोचना चाहिए. खुले मंचो से इस बात पर चर्चा होनी चाहिए कि इस गिरावट के कारण क्या है? और इस गिरावट से कैसे उभरा जा सकता है? युवा कवयित्री प्रियंका सौरभ ने इस स्थिति को अपने शब्दों में कहते हुए सही लिखा है कि-

टूट रहे परिवार हैं, बदल रहे मनभाव। प्रेम जताते गैर से, अपनों से अलगाव।।

परिवार, भारतीय समाज में, अपने आप में एक संस्था है और प्राचीन काल से ही भारत की सामूहिक संस्कृति का एक विशिष्ट प्रतीक है। संयुक्त परिवार प्रणाली या एक विस्तारित परिवार भारतीय संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता रही है, जब तक कि शहरीकरण और पश्चिमी प्रभाव के मिश्रण ने उस संस्था को झटका देना शुरू नहीं किया। परिवार एक बुनियादी और महत्वपूर्ण सामाजिक संस्था है जिसकी व्यक्तिगत और साथ ही सामूहिक नैतिकता को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका है। परिवार सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों का पोषण और संरक्षण करता है। यह कानून का पालन करने वाले नागरिकों को प्रोत्साहन देकर समाज को स्थिरता प्रदान करता है। यह व्यक्ति में सामूहिक चेतना के निर्माण में मदद करता है। परिवार प्रणाली एक एकल, शक्तिशाली किस्में है जो सदियों से है, और विविधता के साथ समृद्ध, सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करती है समाजीकरण में यह भावनात्मक संबंध का प्रमुख स्रोत है, समाजीकरण और नैतिकता को आकार देने के तरीके से सही और गलत की भावना उत्पन्न करता है। बच्चों को उनके माता-पिता, उनके साथियों और उनके समाज के “सामाजिक सम्मेलनों” के अनुसार नैतिक निर्णय लेने के रूप में देखा जाता है। यह व्यक्तिगत चरित्र को मजबूत करता है। यह आदत बनाने का पहला स्रोत है जैसे अनुशासन, सम्मान, आज्ञाकारिता आदि। नैतिक मजबूती के साथ-साथ यह व्यक्ति के परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों को बिना किसी हिचकिचाहट के कठिन समय में भरोसा करने के लिए लचीलापन प्रदान करता है। यह कठिनाइयों से निपटने के लिए अनैतिक साधनों के उपयोग से बचाता है। परिवार लोगों को सांसारिक समस्याओं के प्रति स्त्री के दृष्टिकोण को विकसित करने में मदद करता है। मगर वर्तमान दौर में हम संस्था के रूप में परिवार में गिरावट का कटु अनुभव झेल रहे है-

घर-घर में मनभेद है, बचा नहीं अब प्यार।
फूट-कलह ने खींच दी, हर आँगन दीवार।।
स्नेह और आशीष में, बैठ गई है रार।
अरमानों के बाग में, भरा जलन का खार।।

गिरावट के प्रतीक के रूप में आज परिवार खंडित हो रहा है, वैवाहिक सम्बन्ध टूटने, आपसे भाईचारे में दुश्मनी एवं हर तरह के रिश्तों में कानूनी और सामाजिक झगड़ों में वृद्धि हुई है। आज सामूहिकता पर व्यक्तिवाद हावी हो गया है. इसके कारण भैतिक उन्मुख, प्रतिस्पर्धी और अत्यधिक आकांक्षा वाली पीढ़ी तथाकथित जटिल पारिवारिक संरचनाओं से संयम खो रही है। जिस तरह व्यक्तिवाद ने अधिकारों और विकल्पों की स्वतंत्रता का दावा किया है। उसने पीढ़ियों को केवल भौतिक समृद्धि के परिप्रेक्ष्य में जीवन में उपलब्धि की भावना देखने के लिए मजबूर कर दिया है। वर्तमान स्थिति में भड़काऊ रवैया परिवारों के बिखरने का प्रमुख कारण है. परिवार के अन्य सदस्यों को उच्च आय और कम जिम्मेदारी ने विस्तारित परिवारों को विभाजित किया है। उच्च तलाक की दर निसंदेह सामाजिक रिश्तों को निगल रही है. विवाह के टूटने का प्रमुख कारण एकल रवैये, व्यवहार और समझौता किए गए मूल्यों में प्रौद्योगिकी काला धब्बा है। युवा पीढ़ी का असामाजिक व्यवहार परिवारों को तेजी से नष्ट कर रहा है। आज के अधिकांश सामाजिक कार्य, जैसे कि बच्चे की परवरिश, शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, बुजुर्गों की देखभाल, आदि, बाहर की एजेंसियों, जैसे क्रेच, मीडिया, नर्सरी स्कूलों, अस्पतालों, व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों, धर्मशाला संस्थानों ने ठेकेदारों के तौर पर संभाल लिए हैं जो कभी परिवार के बड़े लोगों की जिम्मेवारी होती थी।

बड़े बात करते नहीं, छोटों को अधिकार।
चरण छोड़ घुटने छुए, कैसे ये संस्कार।।
कहाँ प्रेम की डोर अब, कहाँ मिलन का सार।
परिजन ही दुश्मन हुए, छुप-छुप करे प्रहार।।

परिवार संस्था के पतन ने हमारे भावनात्मक रिश्तों में बाधा पैदा कर दी है. एक परिवार में एकीकरण बंधन आपसी स्नेह और रक्त से संबंध हैं। एक परिवार एक बंद इकाई है जो हमें भावनात्मक संबंधों के कारण जोड़कर रखता है। नैतिक पतन परिवार के टूटने में अहम कारक है क्योंकि वे बच्चों को दूसरों के लिए आत्म सम्मान और सम्मान की भावना नहीं भर पाते हैं। पद-पैसों की अंधी दौड़ से आज सामाजिक-आर्थिक सहयोग और सहायता का सफाया हो गया है. परिवार अपने सदस्यों, विशेष रूप से शिशुओं और बच्चों के विकास और विकास के लिए आवश्यक वित्तीय और भौतिक सहायता तक सिमित हो गए हैं, हम आये दिन कहीं न कहीं बुजुर्गों सहित अन्य आश्रितों की देखभाल के लिए, अक्षम और दुर्बल परिवार प्रणाली की गिरावट की बातें सुनते और देखते हैं जब उन्हें अत्यधिक देखभाल और प्यार की आवश्यकता होती है।

आज ज्यादातर लोग सार्थक जीवन का अभाव झेल रहें है। पारिवारिक प्रणाली के पतन का एक नुकसान ये है कि साझाकरण, देखभाल, सहानुभूति, सहयोग, ईमानदारी, सुनने, स्वागत करने, मान्यता, विचार, सहानुभूति और समझ के गुणों का कम होना है। हाल के दिनों में तनाव की सहनशीलता में कमी, चिंता और अवसाद जैसे मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे बढ़ रहे हैं। परिवार प्रणाली बुजुर्ग सदस्यों से बात करने, बच्चों के साथ खेलने आदि से गहरी असुरक्षा की अभिव्यक्ति के साथ मानसिक रूप से व्यक्ति को राहत दे सकती है। परिवार प्रणाली में गिरावट अधिक व्यक्तियों के लिए मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के मामले पैदा कर सकती है।

भविष्य में संस्था के रूप में परिवार में गिरावट समाज में संरचनात्मक परिवर्तन लाएगी। सकारात्मक पक्ष पर, भारतीय समाज में जनसंख्या की वृद्धि में कमी देखी जा सकती है और संस्था के रूप में परिवार में गिरावट के प्रभाव के रूप में कार्यबल का महिलाकरण हो सकता है। हालाँकि, संयुक्त परिवार से परिवार के संरचनात्मक परिवर्तनों को समझने की आवश्यकता है, कुछ मामलों में इसे परिवार प्रणाली की गिरावट नहीं कहा जा सकता है। जहाँ परिवार प्रणाली किसी सकारात्मक परिवर्तन के लिए संयुक्त परिवार से एकल परिवार में परिवर्तित होती है। वैसे भी भारतीय समाज भी परिवार के संलयन और विखंडन की अनूठी विशेषता का निवास करता है जिसमें भले ही परिवार के कुछ सदस्य अलग-अलग स्थानों में अलग-अलग रहते हैं, फिर भी एक परिवार के रूप में रहते हैं।

बच पाए परिवार तब, रहता है समभाव।
दुःख में सारे साथ हो, सुख में सबसे चाव।।
अगर करें कोई तीसरा, सौरभ जब भी वार।
साथ रहें परिवार के, छोड़े सब तकरार।।

परिवार एक बहुत ही तरल सामाजिक संस्था है और निरंतर परिवर्तन की प्रक्रिया में है। आधुनिकता समान-लिंग वाले जोड़ों (एलजीबीटी संबंध), सहवास या लिव-इन संबंधों, एकल-माता-पिता के घरों, अकेले रहने वाले या अपने बच्चों के साथ तलाक का एक बड़ा हिस्सा उभरने का गवाह बन रहा है। इस तरह के परिवारों को पारंपरिक रिश्तेदारी समूह के रूप में कार्य करना आवश्यक नहीं है और ये समाजीकरण के लिए अच्छी संस्था साबित नहीं हो सकती। भौतिकवादी युग में एक-दूसरे की सुख-सुविधाओं की प्रतिस्पर्धा ने मन के रिश्तों को झुलसा दिया है।

कच्चे से पक्के होते घरों की ऊँची दीवारों ने आपसी वार्तालाप को लुप्त कर दिया है. पत्थर होते हर आंगन में फ़ूट-कलह का नंगा नाच हो रहा है. आपसी मतभेदों ने गहरे मन भेद कर दिए है. बड़े-बुजुर्गों की अच्छी शिक्षाओं के अभाव में घरों में छोटे रिश्तों को ताक पर रखकर निर्णय लेने लगे है। फलस्वरूप आज परिजन ही अपनों को काटने पर तुले है. एक तरफ सुख में पडोसी हलवा चाट रहें है तो दुःख अकेले भोगने पड़ रहें है. हमें ये सोचना -समझना होगा कि अगर हम सार्थक जीवन जीना चाहते है तो हमें परिवार की महत्ता समझनी होगी और आपसी तकरारों को छोड़कर परिवार के साथ खड़ा होना होगा तभी हम बच पायंगे और ये समाज रहने लायक होगा।

 

  • Related Posts

    माया देवी यूनिवर्सिटी के लॉ विभाग में RTI कानून की 21वी वर्षगांठ पर व्याख्यान : उपलब्धियों एवं चुनौतियों पर चर्चा।

    Spread the love

    Spread the love    ब्यूरो देहरादूनः  (नया अध्याय)       माया देवी यूनिवर्सिटी के लॉ विभाग में RTI कानून की 21वी वर्षगांठ पर व्याख्यान : उपलब्धियों एवं चुनौतियों पर…

    शेयर बाजार से सावधान!

    Spread the love

    Spread the love  राजेंद्र रंजन गायकवाड (सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)       बिलासपुर, छत्तीसगढ़                  (नया अध्याय, उत्तराखण्ड)          …

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    You Missed

    दीपावली के दृष्टिगत सल्ट, डोटियाल एवं देघाट में खाद्य प्रतिष्ठानों का सघन निरीक्षण।

    • By User
    • November 1, 2026
    • 1 views
    दीपावली के दृष्टिगत सल्ट, डोटियाल एवं देघाट में खाद्य प्रतिष्ठानों का सघन निरीक्षण।

    स्यालीधार ईवीएम गोदाम में प्रथम स्तरीय जांच जारी, जिलाधिकारी ने किया निरीक्षण।

    • By User
    • November 1, 2026
    • 15 views
    स्यालीधार ईवीएम गोदाम में प्रथम स्तरीय जांच जारी, जिलाधिकारी ने किया निरीक्षण।

    मदमहेश्वर मेले की तैयारियां शुरू, 18 नवम्बर से तीन दिन तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रहेगी धूम जनसहयोग से भव्य रूप में आयोजित होगा त्रिदिवसीय मेला,स्थानीय प्रतिभाओं को मिलेगा मंच।

    • By User
    • November 1, 2026
    • 19 views
    मदमहेश्वर मेले की तैयारियां शुरू, 18 नवम्बर से तीन दिन तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रहेगी धूम जनसहयोग से भव्य रूप में आयोजित होगा त्रिदिवसीय मेला,स्थानीय प्रतिभाओं को मिलेगा मंच।

    हम सबका यह अभियान है, वित्तीय साक्षरता का पैगाम है।

    • By User
    • October 31, 2026
    • 15 views
    हम सबका यह अभियान है, वित्तीय साक्षरता का पैगाम है।

    तीन दिवसीय सामुदायिक मध्यस्थता प्रषिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ…….. 

    • By User
    • October 31, 2026
    • 12 views
    तीन दिवसीय सामुदायिक मध्यस्थता प्रषिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ…….. 

    मैं आजाद था, आजाद हूं, और आजाद रहूंगा

    • By User
    • October 31, 2026
    • 12 views
    मैं आजाद था, आजाद हूं, और आजाद रहूंगा