राजेंद्र रंजन गायकवाड,
(सेवा निवृत्त केंद्रीय जेल अधीक्षक)
बिलासपुर, छत्तीसगढ़
(नया अध्याय, देहरादून)
कवि कभी सोता नहीं है,
गोया, कविता सोने नहीं देती।
रात के अंधेरे हो या दिन उजाले
कवि आँखें मूंदे रहता है।
शब्द और भाव जागते हैं,फिर
चुपके से दिल में उतर जाते हैं।
वे साँस बनकर चलने लगते हैं,
अक्सर कवि सोता नहीं गहरी नींद
बस उसका शरीर थककर लेट जाता है,
कविता की आँखें, भी नहीं झपकतीं।
मुस्कराते, चुपचाप चाँद को चुराती हैं,
तारों को तोड़कर शब्दों का हार बनाती हैं,
फिर अधूरी पंक्तियाँ गुनगुनाती रहती हैं।
नींद आती है तो कविता कहती है
“अभी नहीं, अभी तो बस शुरुआत है।”
फिर कवि करवट बदलता हूँ,
और कागज/ मोबाइल के पटल पर
नाचने लगते हैं, बेसुध शब्द
जो वर्षों, दिल और दिमाग छुपे थे।
दरअसल कविता, कवि की
आँखों में बसती और रगों में दौड़ती है,
और एक दिन कवि दुनियां से उठ जाता है
तब भी कविता जीती/ जागती रहती है।
कभी किसी और कवि की साँस में,
कभी किसी ओर की रात की चुप्पी में।






