कवयित्री
सरोज कंसारी
नवापारा राजिम
रायपुर (छ. ग.)
(नया अध्याय, देहरादून)
अनोखा संगम
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यूँ ही नहीं निकलतें दर्द के अल्फ़ाज
दफ़न होते हैं न जानें कितने अरमान
करुण कराह बन बयाँ होती हैं आह!
टूटते-बिखरते हैं रिश्तों की कई दीवार।
हर कोशिशें जब हो जाती हैं नाकाम
हालातों से समझौता रह जाता विकल्प
जब हर खुशियों को लग जाती हैं दीमक
तब एकांत में होता हैं कुछ नया सृजन।
अपनों के रवैये से रोता भी हैं अंतर्मन
नजर नहीं आती कहीं उम्मीदों की किरण
बंधन रूपी मकड़ी का जाल हैं जीवन
करना पड़ता हैं पग-पग पर ही संघर्ष।
कोई नहीं होता आजीवन ही हमदम
अकेले ही तय करना होता हैं हर सफर
कोरे कागज पर मुखरित होता हैं मौन
भावनाओं को उकेरना नही होता सहज।
एहसासों से सजी होती हैं गीत व गजल
हर मोड़ पर ही मिलता हैं नया अनुभव
खुद को न समझे कभी किसी से कम
छोटी-छोटी बातों से न करें आँखे नम।
सुख-दुख का होता हैं अनोखा संगम
मुसीबतों में थामे रहे धैर्य का दामन
मधुर वाणी से जुड़ते हैं दिलो के तार
कड़वाहट से न घोलें जीवन में जहर।।
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