राजकुमार कुम्भज
जवाहरमार्ग, इन्दौर
(नया अध्याय, देहरादून)
____________________
आत्मा का मोक्ष हैं पुस्तकें.
____________________
काँप रहा है आदमी
पुस्तकें हाँफ रही हैं विचारों से
एक आदमी फटी कमीज में सड़कों पर
कटोरा लिए हाथों में माँगता है अभय
हथियारबंदी का आग्रह है पुनः पुनः
संसारभर के शासनाध्यक्षों से
विनय है, विनम्र है, निवेदन है, अनुरोध है
कि भूलें सब संहार, सँवारें सारा संसार
सफर छोटा है, लंबा है, हैं मुसीबतें भी
पहले से ही जूझ रहे हैं कई-कई सवालों से
अब और नहीं, और नहीं हत्याएँ
खिलाएँ फूल खिलाएँ समूची पृथ्वी पर
भिन्न-भिन्न खुशबुओं पर सवार हों हवाएँ
जल सारा जो खारा है अभी हारा है आदमी
उसी की चिंता में दुबली हुईं जाती हैं पुस्तकें
पुस्तकें देती हैं, पुस्तकों ने ही दिया है रास्ता
क्षितिज हैं पुस्तकालय, पार जिनके अंतरिक्ष
कोई बंधन नहीं, बाँधती हैं मुक्तिबोध से
पुस्तकें दिलातीं हैं हर अंधेरे से मुक्ति
आत्मा का मोक्ष हैं पुस्तकें.
____________________
ईश्वर नहीं है कहीं भी नहीं.
____________________
ईश्वर नहीं है कहीं भी नहीं
अगर है कहीं तो है यहीं पुस्तकों में
सपने हैं तो हैं यहीं, नींद है तो यहीं
मुक्ति यहीं, मुक्तिबोध यहीं, मुक्तिमार्ग यहीं
दु:ख और उदासी यहीं होते हैं असहाय
असहमतों को भी मिलती है जगह यहीं
भीड़ में आता है रास्ता पुस्तकों से ही
पुस्तकों से ही आता है जीवन में लोकतंत्र
लोकतंत्र से ही आता है पुस्तकों में जीवन
ख़तरा है सभी जगह ख़तरा है आजकल
बचाना है सभी को छोड़कर ईश्वर.
____________________







