युगपुरुष कविवर सूर्य
(नया अध्याय, देहरादून)
“उठने की जिद”
(काव्य)
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निराशा आए तो
उसे देखो, स्वीकारो।
वो जमीन की सच्चाई है,
उससे मुंह मत मोड़ो।
किन्तु उसके बाद?
उसके बाद…
अभिलाषा चुननी ही पड़ेगी।
मैं कह रहा हूँ कविवर-हृदय से!
टूट जाना स्वाभाविक है,
किन्तु टूटे रह जाना नहीं।
उठने की जिद ही
मनुज का धर्म है।
(युगपुरुष कविवर सूर्य जी की कलम में आग और सच्चाई दोनों हैं। ये कविता हार मान चुके आदमी को भी उठाकर खड़ा कर दे।)







