—-मजदूर का दर्द—-

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हरी राम यादव           

सूबेदार मेजर (ऑनरेरी) 

अयोध्या

 

              (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

—-मजदूर का दर्द—-

 

सुबह का समय था। सूरज क्षितिज से ऊपर आकर अपनी यात्रा शुरू करने वाला था। कल के काम की थकान के कारण बिंदा की आँख आज थोडा ज्यादा देर लग गयी। आंख खुलते ही वह हड़बड़ा कर उठी। वह हड़बड़ी में इसलिए थी, क्योंकि उसे जल्दी से अपने पति के लिए रोटी बनानी थी। बच्चे भी सोकर उठ चुके थे और खाने के लिए उछल कूद मचा रहे थे। बिंदा का पति उसे जल्दी से रोटी बनाने के लिए कह रहा था। वह डर रहा था कि देर हो जाने से उसे शहर में काम नहीं मिलेगा। शहर का रास्ता लम्बा था। 24 किलोमीटर चलकर उसे शहर जाना होता था। पास में पैसे नहीं होने के कारण मजबूरी वश उसे सामान ढोने वाले ट्रक में रोज शहर तक जाना पड़ता था। ट्रक वाले उधार में भी ले जाने के लिए तैयार हो जाते थे। शाम को मजदूरी के पैसे मिल जाने पर वह चुकता कर देता था।

 

देर हो जाने पर सामन ढोने वाले ट्रक निकल जाते थे, बिंदा के पति वीरेश को यह बात परेशान कर रही थी। उसने बिंदा से जल्दी जल्दी हाथ चलाने को कहा। विंदा ने झुंझलाहट में कहा – मैं मशीन थोड़े हूँ, बना तो रही हूँ। देख नहीं रहे हो। वीरेश सोच रहा था कि इस हफ्ते यदि बराबर काम मिल गया तो बिटिया का स्कूल में एडमीशन करवा दूंगा। इसी आशा में आजकल वह खूब मेहनत कर रहा था। इसी बीच बिंदा चिल्लाई – उह। वीरेश, क्या हुआ ? बिंदा बोली – आपकी जल्दी के चक्कर में मेरा हाथ तवे पर पड़़ गया।

 

वीरेश मन ही मन सोच रहा था कि आजकल पढाई कितनी महंगी हो गयी है। पहले सरकारी स्कूल होते थे। न कोई फीस लगती थी न कोई ड्रेस। स्कूल जाओ और मास्टर जी कान पकड़वा कर रजिस्टर में नाम लिख देते थे। न कोई ड्रेस का झंझट, न कोई स्कूल बैग, न जूते और न कोई टिफिन। गांव के अगली कक्षा में गये बच्चे से पिताजी वर्णमाला की किताब और तख्ती मांग लाये थे। गेंहू देकर बाजार से खड़िया ले ली थी और बहिन ने सेंठा को छीलकर कलम बना दी थी। बस पूरी हो गयी थी स्कूल जाने की तैयारी। जो चाहे पहनकर जाओ। माँ जी खुरदुरे हाथों से रगड़कर मुंह और सिर में सरसों का चुहचुहाता तेल और माथे पर काला टीका लगा देती थीं और बासी रोटी या चबैना – गुड देकर स्कूल भेज देती थीं। हम बच्चे उछलते कूदते स्कूल पहुँच जाते थे। आजकल तो 17-18 हजार एडमीशन और कापी, किताब, जूते, मोज़े के लग जा रहे हैं, स्कूल वाहन का हर महीने किराया अलग से देना पड़ता है।

 

वीरेश ने पिछले चार पांच महीने कमाकर बिटिया की पढाई के लिए कुछ पैसे बचाये थे, वह सब पिताजी की बीमारी में लग गए। सब जमा पूंजी खर्च हो गई। पास में धेले भी नहीं बचे थे। आयुष्मान कार्ड बनाने वाले साहब से काफी मिन्नतें की थीं कि – साहब बना दो। हम लोग गरीब आदमी हैं। रोज कुंआ खोदकर पानी पीने वाले हैं। लेकिन साहब नहीं पसीजे तो नहीं पसीजे। कागजों के बहाने में घुमाते रहे। सरकारी अस्पताल तो बस नाम के हैं, बीमार हो जाने पर न तो दवा मिलती है न पट्टी। सब कुछ बाहर से खरीदना पड़ता है। बस उनके पास है तो बड़े बड़े अक्षरों में लिखा नाम – प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला चिकित्सालय, मेडिकल कालेज और कागज पर रेफर लिख कर भेज देना।

 

बिंदा जल्दी जल्दी हांथ चलाकर रोटी बना चुकी थी। उसने वीरेश को पुकारा – कहाँ खोये हो, रोटी बन चुकी है। वीरेश ने जल्दी से हाथ धोया और हाथ में ही दो रोटी लेकर गोल की और गुड़ के साथ जल्दी जल्दी खाने लगा। तब तक बिंदा उसके डिब्बे में सब्जी और कपड़े में रोटी बाँध चुकी थी। वीरेश ने जल्दी से प्लास्टिक की बोतल में पानी भरा और बोरी से बने थैले में सब सामन डालकर चलने के लिए तैयार हुआ। तभी विंदा ने टोका – पानी तो पी लीजिए। वीरेश मन ही मन बुदबुदाया – अरे ! जल्दी के चक्कर में मैं तो पानी पीना ही भूल गया।

 

वीरेश अपना रोटी का थैला पकडे तेज तेज कदमों से गाँव की पगडण्डी से पक्की सड़क की ओर चल पड़ा। उसके मन में यह शंका बार बार उभर रही थी कि यदि शहर जाने वाली ट्रक नहीं मिला तो क्या होगा। इस आशंका में उसकी सांसे धौंकनी की तरह चल रही थी। रोड पर पहुंचते ही उसके बगल के गांव का बलवान खड़ा दिखाई दिया तब उसने चैन की साँस ली। बलवान ने वीरेश से कहा – शायद सभी ट्रक जा चुके हैं, एकाध बचे हों तो ठीक है। आज मुझे भी देर हो गयी थी। तभी हॉर्न बजाता हुआ एक ट्रक दिखाई पड़ा। वीरेश ने हाथ दिया और ट्रक रुक गया। दोनों अपनी रोटी का थैला संभाले, ट्रक में सवार होकर काम की खोज में शहर की ओर चल पड़े़। यह केवल बिंदा, वीरेश और बलवान की ही कहानी नहीं है अपितु असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले उस हर श्रमिक की कहानी है जिसे दो जून की रोटी कमाने के लिए शहर की ओर भागना पड़ता है।

 

श्रमिक किसी भी देश के विकास की रीढ़ होते हैं। इनके श्रम के बिना न तो कोई उद्योग धंधा चल सकता है और न ही कोई देश विकास की ओर अग्रसर हो सकता है। संगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिक तो अपने अपने संगठनों के माध्यम से दबाव डालकर अपने अधिकारों को काफी हद तक पा लेते हैं लेकिन असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले श्रमिकों का शोषण आम बात है। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर का काम अनिश्चित होता है। उसे यह नहीं पता होता कि आज काम मिलेगा या नहीं। वह काम की तलाश में एकदम सुबह घर से खाने का डिब्बा लेकर निकलता है और सड़कों के चौराहों पर खड़ा होकर काम मिलने का इंतजार करता है। यदि काम मिल गया तो ठीक, नहीं तो गाड़ी का किराया देकर पुनः घर की ओर निराशा और टूटे हुए स्वप्न लिए चल पड़ता है।

 

हमारे देश के राजनीतिक दल चुनाव के समय अपने अपने मेनिफेस्टो में बड़े बड़े वादे करते हैं लेकिन आजादी के बाद से मजदूर के जीवन में कोई परिवर्तन नहीं हुआ है। वही अनिश्चितता आज भी है जो 78 वर्ष पहले थी। न तो काम मिलने की गारंटी है और न ही बीमार पड़ने या कोई दैवी आपदा आने पर खाने पीने कि व्यवस्था का इंतजाम। इसका सबसे बड़ा उदाहरण कोरोना काल में देश के विभिन्न भागों से मजदूर वर्ग का पलायन था। वर्त्म्मान समय में भी उपजे एल पी जी के संकट ने मजदूरों को रोजगार वाले शहरों से पलायन के लिए मजबूर कर दिया है।

 

यदि देश में मजदूरों की संख्या की बात की जाए तो बढती जनसंख्या और बेरोजगारी के साथ यह तेजी से बढ़ी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारों द्वारा मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए रोजगारोन्मुखी योजनाएं बनायी जाएं। हर राज्य अपनी जनसंख्या के अनुसार रोजगार का सृजन अपने राज्य में ही करें ताकि किसी प्रदेश के श्रमिक को दूसरे प्रदेश में रोजगार के लिए न जाना पड़े तथा अमानवीय कृत्यों का सामना न करना पड़े। यह भाषणों से नहीं होने वाला है, सतही तौर पर समस्याओं को समझकर गांव में काम करने से होगा। इस तरह की योजनाएं शहरों की वातानुकूलित कमरों में बैठने वाले लोग नहीं बना सकते। इस तरह की योजनाएं गांवो में रहने वाले लोग ही बना सकते हैं। विकास बातों में नहीं, विकास हाथों में दिखना चाहिए।

 

 

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