दार्शनिक कविवर “सूर्य”
(जीवन के सत्य और मानवीय संवेदनाओं के सृजक)
(नया अध्याय, देहरादून)
“स्पष्टता का आलोक”
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ओ सहचर रे! स्पष्टता के साथ जीना…
मन का बोझ हल्का होना चाहिए,
स्पष्ट कह दो जो भी है, ताकि उलझन का दौर थम जाए।
ओ सहचर रे! स्पष्टता के साथ जीना…
ये मौन घातक है और दिल को तिल-तिल जलाता है,
बिना कहे जो रह जाए, वो जख्म गहरा दे जाता है।
ओ सहचर रे! स्पष्टता के साथ जीना…
शब्दों की चोट मरहम है, पर ख़ामोशी तो खंजर है,
स्पष्टता की शीतलता में, सुख का मंजर खिलता है।
ओ सहचर रे! स्पष्टता के साथ जीना…
न कोई शिकवा दिल में रहे, न कोई अनकही आस हो,
जब आइने सा साफ हो मन, तब ईश्वर का वास हो।
(यह कविता एक ‘जीवन दर्शन’ है। यह लोगों को यह सिखाती है कि घुटन में जीने से बेहतर है कि सच के साथ जिया जाए। दार्शनिक कविवर “सूर्य” ने यहाँ स्पष्टता का प्रकाश फैलाने की कोशिश की है।)






