तुम बूँद नहीं, सागर हो! अनंत संभावनाओं का विस्तार हो।

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री/लेखिका/शिक्षिका

अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति

(गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, छ.ग.)

 

 

              (नया अध्याय, देहरादून)

 

 लेख –

तुम बूँद नहीं, सागर हो! अनंत संभावनाओं का विस्तार हो।

                -सुश्री सरोज कंसारी

   ——————————————————-

 

 अरे ओ मानव, तू तो खुद में ही एक अनंत संसार है,

 भीतर तेरे छिपा हुआ असीम संभावनाओं का सार है।

 

मनुष्य के भीतर वह सब कुछ विद्यमान है, जिसे पाने के लिए उसे वास्तविकता का सामना करना होगा। दुनिया की हर बड़ी खोज या बदलाव की शुरुआत इंसान के अंतर्मन से ही होती है। रुकिए नहीं! भागिए नहीं! आज का युग पाश्विक और हिंसक प्रवृत्ति वाले लोगों से भरा है, जिनसे सावधान रहना अनिवार्य है। जीवन में हर मोड़ पर परीक्षा होती है। जो खुद को पहचान लेता है, वही हर तूफान को पार कर जाता है। “बूंद नहीं, सागर बनो।” तभी इस दुनिया की भीड़ में खुद का अस्तित्व बना पाओगे, अन्यथा कुछ लोभी, भोगी, स्वार्थी लोग अपने लाभ के लिए आपके स्वाभिमान को कुचल देंगे। इंसानियत अब सिर्फ बातों में सिमट कर रह गई है। हकीकत पर षड्यंत्र के परदे पड़े हैं।

 

आज सोशल मीडिया का जमाना है। लोग प्रसिद्धि पाने के लिए नई तकनीक का हर पल उपयोग करते हैं। करुणा, दया, स्नेह, सहानुभूति, प्रेम आज दिल की गहराई से नहीं, सब बनावटी होता है जिसमें सच्चाई नाम मात्र की होती है। आज लोग सहयोग करते कम, उसे दिखाते ज्यादा हैं।

 

षड्यंत्र से भरे इस माहौल में खुद को बचाकर रखना जरूरी है। अपने आँसू, दर्द और समस्याओं को हर किसी को मत दिखाइए। लोग झूठी संवेदनाएं व्यक्त कर आपका मजाक बनाने में माहिर हैं। आज अपनों और गैरों में अपनापन और विश्वास ढूँढ पाना कठिन है। हर पल लोग खुद को अपडेट करने में लगे हुए हैं। अच्छाई और सच्चाई को चंद मिनटों में डिलीट करने और चालाकी से आपकी अच्छाई को बुराई में एडिट करने के कई उपकरण बन गए हैं।

 

याद रखिए, स्क्रीनशॉट लेकर कुछ ही क्षण में नमक मिर्च लगाकर वायरल करने का यह समय है। सावधान! भावनाओं में बहकर किसी के भी सामने समर्पित मत हो जाना। सचेत होकर खुद को संभालने और असीम साहस जुटाने का यह वक्त है।

 

कहीं आपकी सादगी, भोलापन और मासूमियत आपकी बर्बादी का कारण न बन जाए। समय के साथ खुद के हुनर, बल और बुद्धि का सही उपयोग करना सीखिए। खुद को हर पल तराशते रहिए। किसी कमी, तकलीफ या समस्या को लेकर खुद को कोसना जिस दिन बंद कर देंगे, भाग्य के दरवाजे उसी दिन खुल जाएंगे।

 

जीवन क्षणिक है इसलिए हर तरह के बोझ को उतार कर चलिए। कमजोर बनकर आप जीवन का आनंद नहीं ले पाएंगे। स्पष्ट, सचेत और सक्रिय होकर कार्य कीजिए। कुछ भी स्थिर नहीं रहेगा। समय की रफ्तार में सब कुछ देखते देखते खो जाएगा। इसलिए जब तक जीवन है, बिना घबराए लड़ते रहिए। इम्तिहान कभी खत्म नहीं होते। बस अपने दिल और दिमाग को अपने वश में रखिए।

 

जो भी कमी है, उसका दुख मनाते मत बैठिए। सुधार करते रहिए। शक्ति और सामर्थ्य जुटाते रहिए और धैर्य बनाए रखिए। चाहे आप जिस हालात में भी हों, खुद को मजबूत बनाने की कोशिश कीजिए। विपरीत हालात में खुद पर तरस खाना बंद कीजिए। बनते बिगड़ते जीवन के खेल में कभी निराशा तो कभी आशा होती है। बस जो है उसी को लेकर आगे बढ़िए।

 

अपने जीवन की हर कठिनाई को पार करने और खुद को बेहतर बनाने की ठान लीजिए। कुछ पाने के लिए गलत तरीका मत अपनाइए, सही रास्ते अपनाइए। जीवन में बहुत कुछ ऐसा होता है जो हम सोचते नहीं। कुछ रुलाते हैं, कोई भटकाते हैं तो कोई सबक देते हैं। जो हो गया उसे भूलिए। सब समय की बात है। सब्र कीजिए। सब विधि के विधान के अनुसार ही होता है।

 

मन को दुर्बल मत कीजिए। घृणा, नफरत, बैर, ईर्ष्या और तुलना करके खुद को मत गिराइए। शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहना आपकी सबसे जरूरी जिम्मेदारी है। जीवन की हर चुनौती का सामना आप तभी कर पाएंगे जब अपनी कुंठित मानसिकता को छोड़ेंगे, अपना मूल्य समझेंगे, और निर्भीक होकर अपने हक के लिए लड़ने की क्षमता रखेंगे।

 

संयम, संस्कार और सद्व्यवहार बनाए रखिए। लेकिन जो बार बार आपको गिराने, हराने और डराने की कोशिश करे, वहाँ छल, दंभ, दंड और भेद की नीति अपनाना गलत नहीं। अपने स्वाभिमान, सम्मान और चरित्र की रक्षा के लिए हमेशा जागरूक रहिए। अपनी कमियों पर अफसोस करना बंद कीजिए और सुधार के प्रयास कीजिए। हम इंसान हैं, हर दृष्टि से पूर्ण नहीं हो सकते। अपनी सामर्थ्य को जानकर उसके अनुसार ही मेहनत करते रहिए।

 

जब बूंद के समान खुद का मूल्यांकन करते हो तब आपको हर छोटी समस्या बड़ी लगती है। मन के मुताबिक कोई कार्य न हो तो हार मान लेते हैं। कोई घटना दुर्घटना हो जाए, प्रिय वस्तु खो जाए तो अति में सोचकर बीमार हो जाते हैं। किसी के दुर्व्यवहार को दिल से लगा लेते हैं। किसी की टीका टिप्पणी आपके मन मस्तिष्क में घूमती रहती है। खुद को नाकाम मान लेते हैं। औरो को खुश देख खुद को हीन भाव से देखते हैं। संकुचित सोच से जब खुद का बूंद भर आकलन करते हैं तब आपको आसपास बिखरी खुशियाँ दिखाई नहीं देती।

 

जीवन को अगर साकार करना है, खुद का अस्तित्व जीवित रखना है और शक्तिशाली बनकर रहना है तो सागर जैसा व्यक्तित्व रखिए। अकेली बूंद का कोई महत्व नहीं। सागर में मिलकर वह विशाल बन जाती है। वैसे ही समस्याओं में धैर्य रखकर खुद में जोश, जुनून और मानवीय गुणों को भरते रहिए। एक दिन सफल, समृद्ध और सुखी बनकर निकलेंगे और जीवन की हर चुनौती का सामना सहजता से कर लेंगे। बहते रहिए, रुकिए मत। बाधाओं को लाँघकर ही मंजिल तक पहुँचेंगे। जब आप सागर जैसे विशाल व्यक्तित्व रखते हैं तब आपमें अनंत ऊर्जा समाहित हो जाती है।

 

जब तुम हर परिस्थिति में टूटकर भी अडिग खड़े रहना सीख जाते हो, तो हर दुख पर विजय प्राप्त कर लेते हो। छोटी सोच बूंद है, प्रेमपूर्ण हो जाना सोच का विस्तार है। सागर बनकर स्थिर, शांत रहना और देना सीखिए। किसी के पीछे बेवजह भागना, उम्मीद करना, तड़पना, सांत्वना बटोरना और दया का पात्र बनना छोड़ दीजिए।

 

एक बूंद के जैसे सोचने से जो हम पकड़कर रखते हैं उसे खो देने का भय रहता है। सागर सा हृदय रखने से हम हर चिंता से मुक्त हो जाते हैं। आपकी अच्छाई और सच्चाई लोगों को स्वयं आपकी ओर आकर्षित करती है। इसलिए याद रखो, तुम किसी की कृपा नहीं, खुद के कर्मों का परिणाम हो। बूंद बनकर सूख जाओगे, सागर बनकर अमर हो जाओगे।

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