डॉ0 हरि नाथ मिश्र
पूर्व विभागाध्यक्ष-अँगरेजी,
का0 सु0 साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
अयोध्या, (उ0प्र0)
(नया अध्याय, देहरादून)
त्रिपदियाँ
देख सियासी कथा-कहानी,
भर आता आँखों में पानी।
बातें आतीं याद पुरानी ।।
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जन-प्रतिनिधि थे देश-समर्पित,
त्याग-भाव से तन-मन अर्पित।
पूजनीय सब प्रतिनिधि वंदित।।
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अब तो सत्ता-लोभ सताए,
किसी तरह कुर्सी मिल जाए।
लालच-घन रह मन-नभ छाए।।
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पक्ष-विपक्ष की एका गायब,
गया सदन बन गेह अजायब।
मुखिया सब बन,बनें न नायब।।
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जहाँ आपसी मेल नहीं है,
समझो बिगड़ा खेल वहीं है।
हते मीन को ह्वेल यहीं है।।
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राष्ट्र-भाव को सभी जगाओ,
घृणा-द्वेष को दूर भगाओ।
राष्ट्र-भक्ति का गीत सुनाओ।।







