हर दिन नया सूर्योदय.

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राजकुमार कुम्भज

ज‌वाहरमार्ग, इन्दौर,

 

            (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

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हर दिन नया सूर्योदय.

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हर दिन नया सूर्योदय 

जमाने भर का बोझ है पीठ पर 

मेरा जरा कुछ भी है नहीं इसमें 

कुछ इसका है, कुछ उसका है 

कुछ है ज्ञात-ज्ञात भी शायद 

कि पता-ठिकाना तक याद नहीं 

छाले हैं पैरों में वक्त ने दिए जो

सीमाएँ हाथों की संकुचित करता है वही 

सोचता हूँ कि लड़ना-झगड़ना

किस किससे और क्यों 

जबकि किश्तों में, किस्सों में

बँट गई है जिंदगी 

भूल गया हूँ वाकई भूल गया हूँ मैं 

कि खुली पीठ हूँ किसकी 

किसकी है जिम्मेदारी मुझ पर 

हर दिन नया सितम, हर दिन नया ज़ख़्म 

हर दिन नये आँसू हैं अगर मेरे लिए 

तो है कहीं थोड़ी खुशी भी

जिसे ढूँढ़ता ही रहता हूँ मैं अक्सर

अपनी आधी-अधूरी कविताओं में 

और यही-यही समझते हुए कि जैसे 

हर दिन नया सूर्योदय.

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एक आदमी था, एक दृश्य था.

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एक आदमी था, एक दृश्य था 

दृश्य था, दृश्य में अदृश्य था बहुत कुछ 

बहुत कुछ अदृश्य में एक अजीब दृश्य था

अजीब दृश्य में एक अजीब आदमी था 

अजीब आदमी, अदृश्य में दहाड़ता था 

अदृश्य था, आदमी था, दहाड़ता था 

चीखता, चिल्लाता और डकारता था

उसकी चीखें, चिल्लाहटें और डकारें 

सर्वदा गूँजती रहतीं थीं दृश्य में 

कहने को कहा जाता था यही-यहीे 

कि दृश्य में सबसे अच्छे दिन थे

कि दृश्य में सबसे बुरे दिन थे 

लोग हॅंसते थे कि रोते थे, पता नहीं 

जरा भी किसी को पता नहीं होने देते थे 

शायद हँसते-हँसते रोते थे, पता नहीं 

शायद रोते-रोते हँसते थे, पता नहीं 

यही एक अजीब कहानी थी अदृश्य में 

जिसे दोहराती थी कविता दृश्य में

दृश्य था, दृश्य में अदृश्य था बहुत कुछ 

एक आदमी था, एक दृश्य था.

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