मेरा मन मंदिर है !

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सुश्री सरोज कंसारी

कवयित्री-लेखिका-शिक्षिका

अध्यक्ष – दुर्गा शक्ति समिति

गोबरा नवापारा-राजिम, रायपुर, (छ.ग.)

 

           (नया अध्याय, देहरादून)

 

 

 

                        लेख 

                मेरा मन मंदिर है !

             : सुश्री सरोज कंसारी

 

“मन को मंदिर बनाकर दया के दीप जलाएं, ताकि नफरत मिटे और सद्भाव महक उठे।”

——————————————————

 

जब मन मंदिर की तरह करुणा और दया से रोशन होता है, तो नफरत का अंधेरा मिट जाता है और जीवन में सद्भाव की शुरुआत होती है।

 

मेरा मन मंदिर हो जाए, सब जीवों का इसमें वास रहे,

नफरत की धूल न टिक पाए, बस करुणा का अहसास रहे।

जले दीप दया के अंतर में, मिट जाए जग का अंधियारा,

हर हृदय बने पावन संगम, बहे सद्भाव की निर्मल धारा।

 

जीवन के इस सफर में चलते हुए जब मानसिकता थक जाती है, तो मन में विविध खयाल आते हैं। कुछ विचार हमें दिशा देते हैं, कुछ भटकाव। मन एक ऐसा स्थान है जहाँ सोच के सही प्रवाह से जीवन सुंदर, सुखी और समृद्ध बनता है, वहीं नकारात्मक सोच से हम अपनी ही बर्बादी की ओर चले जाते हैं। इस सांसारिक जीवन की भीड़ में मानसिक संतुलन बनाए रखना, सरल और शांत रह पाना कठिन है। हर क्षण मन में कई तरह की सोच संग्रहित होती रहती है। जहाँ सुखद माहौल, लोग और कार्य हों वहाँ हम विचलित नहीं होते। जिस जगह रहने से अपनत्व न हो, दूषित विचारधाराएँ हों, या यूँ कहें कि सोच के विपरीत होने से, जिस माहौल में हम सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते वहाँ बेचैनी होती है। जीवन का आनंद लेने के लिए मन का स्थिर और शांत होना जरूरी है। मन से ही जीवन का हर तार जुड़ा है। मन को मंदिर बना लीजिए, हर पल सुंदर हो जाएगा। तन का क्या, यह तो नश्वर है। आत्मा सत्य है, अमर है। जब आत्मा में परमात्मा का वास मान लेते हैं, तो हर सांस में उसकी ही महक आती है। मंदिर में जाकर जैसे हमें सुकून मिलता है, वहाँ का वातावरण स्वच्छ, सुंदर और सुकून भरा होता है, जहाँ जाकर हम अपने दिल का हर दर्द कहते हैं, मौन प्रार्थना करते हैं और शांति का अनुभव करते हैं। वैसे ही मन को देवालय बना लेने से हर लम्हा हममें सद्विचार प्रवाहित होंगे। सांसारिक जीवन के मोह, माया, मद, भोग, विलास और भोग वासना से मुक्त हो पाएंगे। हम सात्विक जीवन अपनाकर अनावश्यक चिंताओं से दूर होंगे। धर्म, आध्यात्म और नैतिकता सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं, जीवन का अनिवार्य अंग हैं। जितना अधिक हम धर्म सम्मत आचरण करेंगे उतना ही जीवन सरल, सुखी और संतुष्ट हो पाएगा। मन का हर कोना पवित्र भाव से भरा हो तो दिल से की गई मिन्नतें ईश्वर तक अवश्य पहुँचती हैं। कुविचारों के अंत होने से ही मन मंदिर में ईश्वर के साक्षात् दर्शन होते हैं।

 

मन को मंदिर बनाने के लिए आस्था, भक्ति, श्रद्धा और विश्वास का दीप जलाकर रखिए। मन को मंदिर मान लेने से ईश्वर को सदैव अपने करीब पाएंगे। हर सांस में ईश्वर का आभास होगा। सारे शिकवे, शिकायत, नफरत, घृणा भूलकर बस नेक कर्म कीजिए। जिसका मन मंदिर हो जाता है उनके जीवन की बागडोर खुद भगवान संभालते हैं। मन को मंदिर बनाने का महत्व…मन का मंदिर बन जाना केवल एक आध्यात्मिक विचार नहीं, बल्कि जीवन को बदल देने वाला सूत्र है। जब मन शांत और पवित्र होता है तो तनाव, भय और चिंता स्वतः कम हो जाते हैं और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। ऐसा व्यक्ति समाज के लिए भी दीपक बनता है, क्योंकि उसके आचरण से प्रेम, करुणा और सहयोग का वातावरण बनता है। नैतिक दृष्टि से भी इसका गहरा महत्व है, कुविचार हटते ही व्यक्ति अधर्म और छल से दूर हो जाता है, सत्य और सेवा उसके स्वभाव में आ जाती है। व्यावहारिक जीवन में भी एकाग्र और स्थिर मन से काम की गुणवत्ता बढ़ती है और छोटे-छोटे विचलन हमें लक्ष्य से भटका नहीं पाते। सबसे बड़ा महत्व यह है कि मन के मंदिर बनते ही हमें ईश्वर को बाहर खोजने की जरूरत नहीं रहती, वह भीतर ही मिल जाता है।

 

दृढ़ संकल्प कीजिए हमेशा सही राह चलने की, सच के साथ जीवन जीने की। जब हम मन में दीन, दुखी, गरीब, असहाय, बीमार के प्रति मानवीय संवेदना रखते हैं तब अंतर्मन खुशियों से भींग जाता है। किसी जरूरतमंद की समय पर की गई सहायता, दया, क्षमा, करुणा और दान जीवन की सबसे बड़ी पूजा है जिससे हमें अदृश्य आशीर्वाद प्राप्त होता है। दिखावे के लिए किसी से सहानुभूति रखने की बजाय, वक्त पर नि:स्वार्थ भाव से किया गया सहयोग सबसे बड़ी सेवा है। आंतरिक शांति के लिए नेक कर्म करते रहिए। मन को हर समय परहित में लीन रखें। प्रेम की लौ जलाकर जीवन को दिव्य बना लें। इस लौकिक जीवन का मोह त्याग कर अलौकिक बनें।

 

हर धड़कन में ईश्वर है। जिस दिन हमारे हृदय धड़कना बंद हो गया यह जीवन ज्योति बुझ जाएगी, इसलिए ईश्वर का स्मरण करते रहें। उनके दिए इस तन और मन को हमेशा औरों को खुशी देने में उपयोग कीजिए। दुआ में रहिए हर दिल में, बद्दुआ से बचिए। मन मंदिर में स्वार्थ भाव रखकर की गई पूजा कभी स्वीकार नहीं होती। गलत विचारों को मन में प्रवेश मत होने दीजिए, अच्छी सोच रखिए। जीवन जीने के लिए कुछ नियम खुद बनाइए जो आपके मन को स्वस्थ, प्रसन्न और जीवन को उत्कृष्ट बनाने में सहयोगी हों। दिन भर किए कार्य का आत्म मंथन कीजिए। हर दिन अच्छाई को जोड़िए और बुराई को छोड़िए। मन को एकदम शांत रखें।

 

मन मंदिर बन जाने से हृदय में पवित्रता का समावेश हो जाता है। अंतरद्वंद्व दूर होते हैं। जीवन में किसी तरह का भय नहीं रहता। भीतर भगवान है यह अनुभव होने से ही मन एकाग्र हो जाता है, बाहरी शोर हमें सुनाई नहीं देता, दैवीय गुणों का मन में संचार होता है। आत्म शांति होने से हम सांसारिक जीवन के भटकाव से मुक्त हो जाते हैं। मन का हर कोना प्रेम से भरा होता है। जो भीतर से निश्चल हो जाते हैं उनमें असीम ऊर्जा होती है। वे हर संदेह से परे हो जाते हैं।

 

ये याद रखना चाहिए कि मन को मंदिर बनाना एक दिन का काम नहीं, यह रोज़ाना का अभ्यास होता है। जैसे मंदिर में रोज दीप जलता है, सफाई होती है, भजन होता है, वैसे ही मन को भी रोज सत्कर्म, सच्चे विचार और मौन प्रार्थना से स्वच्छ रखना पड़ता है। जिस दिन हमारा मन पूरी तरह मंदिर बन गया, उसी दिन यह जगत-संसार हमारे लिए स्वर्ग बन जाएगा। तब न कोई दुख सताएगा, न कोई मोह बाँध पाएगा। बस एक अटूट आनंद, एक गहरी शांति हर पल साथ रहेगी। इसलिए आज से ही अपने मन में ईश्वर का आसन सजाइए, और जीवन को मंदिर का प्रसाद बना लीजिए।

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